*********आखिर कब तक लूटोगे ***********
*********आखिर कब तक लुटोगे************
============================================
अपने पैर पर कुल्हाड़ी मरने वाली युक्ती को चरितार्थ होते हुए हम
अक्सर देखते हैं .इतिहाश से सबक ना सीखने की गलती दुहराते
हुए लोगो को हम रोज देखते हैं .अब पछताए क्या होत है का
मुहावरा कहते हुए हम लोगों को अक्सर सुनते हैं .समय -समय पर
समाचार पत्रों में,टी.वी. चैनलों में खबर आती है फला -फला कम्पनी
लोगों की मेहनत की जरूरतमन्दों की गाढ़ी कमाई जो उन्होंने अपना
पेट काटकर आड़े वक़्त के लिए ,बेटा -बेटियों के विवाह के लिए लेकर
अपने इलाज़ के लिए संचित कर रखी थी ,लालच देकर विभिन्न नामों से
चालू की गई कम्पनीयों के मालिको द्वारा लूट ली गयी ,लेकर रफूचक्कर
हो गये यह सिलसिला कब थमेगा .ऐंसा क्यों होता है ? इसके लिए हम
खुद ही जिम्मेवार हैं क्योंकि "लालच बुरी बला होती है ,जो ले डूबती है "
लोग समझते क्यों नहीं हैं .
गाँव -गाँव में शहरों में कदम कदम पर बैंको की शाखाएं खुली हुई हैं फिर
भ़ी लोग इनमे खता खोलकर अपनी रकम जमा नहीं करते अपने करीबी
रिश्तेदारों ,जो विभिन कम्पनियों में एजेंट ,प्रमोटर .प्रबंधक .के पद पर
कार्य कर रहे होते हैं के बहकाने मे आकर उनपर भरोसा कर अपना पैसा
लगते हैं जिसमे जीवन बीमा , और अधिक ब्याज का लालच होता है कम
समय मे अधिक रकम मिलने का लालच होता है जो धोखे का कारण बनता
है जिसकी बुनियाद झूठ पर आधारित होती है .ऐंसी कम्पनीयां समाचार
पत्रों में बड़े बड़े विज्ञापन देकर लोगो को सुनहरे सपने दिखती हैं भ्रमित
करती हैं बड़े बड़े दावे करती हैं बड़े भव्य आफिस खोलकर प्रभावित करती हैं
रिजर्ब बैंक लाएसेंस का उल्लेख कर जमा संग्रहण की अनुमती का दावा करती
हैं इनकी जाँच करने वाली एजेंसियों द्वारा प्रभावी कदम उठाने के प्रयासों की
जरूरत महसूस होती है सामाजिक संगठनों ,सामाजिक कार्यकर्ताओं ,प्रजातन्त्र
के ४थे स्तभ ,साहित्यकारों शासन प्रशासन के द्वारा जागरूकता लेन की आवश्यकता
है थोश अभियान चलाने कि जरूरत है .जब तक हम ऐंसे प्रयास नहीं करेंगे लोग
जागरूक नहीं होगे तब तक भले गरीब लुटते रहेंगे .लूटने वालों के हौशले बुलंद
होते रहेंगे चालक अपनी तिजोरियां भरते रहेंगे .अफ़सोस होता है लोग क्यों
भूल जाते हैं
"माखी गुड में गडी रहे ,पंख रहे लिपटाय,हाँथ मले और सर धुनें लालच बुरी बलाय "
लोग अपने पैरों पर खुद कुल्हाडी मारना कब छोड़ेंगे .मत भूलो ,खत्म करता है कौन
किसको इसमें होता है खुद का हाँथ ,फिर शासन प्रशासन स्तर पर लुटेरोंके खिलाफ
ठोस कदम उठाने की जरूरत है ,ऐंसा नहीं है उसका ध्यान इस ओर नहीं है बुराई को
जड -समूल खत्म करने के जरूरत है .
मुझे याद आती है १९६६ की घटना ,जब मैंने ११थ मेट्रिक ककी परीक्छा पास की थी
बाबूलालटाकीज के पास बिडिंग में मैंने इक नवकेतन पब्लिशर्स कम्पनी के विज्ञापन
के आधार पर सम्पर्ककिया आलीशान आफिस था .प्रबंधक को मैंने अपना परिचय
दिया आवेदन दिया ,मुझे इक फार्म दिया और भरने कहा मैंने पुचा काम क्या करना
होगा ?वेतन क्या मिलेगी ?प्रबन्धक ने बताया हमारी संस्था पब्लीकेशन का कार्य करती
हैं इक डायरेक्टरी निकल रही है ,एजेंटों को २००/ मासिक मिलेगा .अजेंतो कोविज्ञापन
कलेक्ट करना है ,इससे प्राप्त रकम कम्पनी के जालन्धर में कार्याय पैसा सीधे भेजना है
अपनी सेलरी काटकर.प्रबंधक ने बताया रायगढ़ में एजेंट की जगह खाली है आप चाहें तो
आवेदन कर सकते हैं मैंने पूछा आपकी कम्पनी का रजिस नम्बर क्या है ?बताया गया
रजिस .नम्बर की आवश्यकता नहीं है ..सोचता हूँ कहकर बैठ गया .मैंने देखा जो भ़ी
आया अपढ़ ,पढालिखा सबको यही कहा गया वगैर साक्छात्कार लिए सभी को ५००/
स्र्क्छा निधी लेकर एजेंट निउक्ती का आदेश दिया गया .मेरा माथा ठनका मैंने उव्कों से
चर्चा की सबने अनसुना कर दिया .इसके पश्चात शिटी-कोतवाली गया थानेदार को सब
बताया सुनकर बोला देख लेंगे ,पचे गये प्रश्नों का जवाब दिया .ऐना लगा पुलिस भ़ी उनसे
मिली हुई है पर सुबह शंका निर्मूल साबित हुई ,जब समाचार पत्र में खबर पढ़ा कि नवकेतन
पब्लिशर्स का कार्यालय सील कर प्रबन्धक को गिरफ्तार कर लिया गया .आगे कार्यवाही
जरी है .
मैंने अपने अनुभव को इक व्यंग कविता के रूप में लिखा "एक बेरोजगार की व्यथा "इसे
मैंने आकाशवाणी रायपुर भेजा बेह्द्खुशी जब इसे स्वीकार कर स्वयम पढ़े के लिए मुझे
आमंत्रित किया जिसका प्रसारण ८.५.१९७९ को हुआ " संयोग से मेरे पत्नी का जन्म दिन था'
जो आज भी प्रासंगिक है कुछ प्न्तीयाँ दे रहा हूँ
कल के इंतज़ार में हम
रात भर करवटें बदलते रहे .
ख़ुशी -ख़ुशी में
खुले के खुले रह गये किवाड़
सुवह -सुवह नीद लगी झुश गये चोर
चुराकर ले गये सारा सामान
हम अपना पीट रहे थे सर
कमरे में वहफुलपैंट नहीं था
जिसमे परिचय वाला कार्ड था
हमारा बन्त्ताधार था
मुहल्ले में मच गया हल्ला
लुट गया लल्ला
दिन भर हम
भगवन को फिरते रहे कोसते
भगवान् कुछ तो रहम करते
जब कुछ नहीं दे सके
फिर क्यों हो छीनते
दिन भर हम घुमे पागलों से
गये वहां
जहाँ मिले थे वह सज्जन
गये वहां
जहाँ उतरे थे वह सज्जन
खूब लगाया पता
कुछ नहीं हुआ हासिल
घर के बुध्धू घर को आये
अपना मनहूस चेहरा लटकाए
मुहल्ले में हमने
किसी से नहीं की कोई बात
कारण सांत्वना के शब्द
चुभते हैं कील से
कैद हो गया कमरे में जाकर
दोस्तों ने पड़ोसियों ने
सम्पर्क करने की ,
की कोशिश बहुत
मगर गईं सब व्यर्थ .
*********आखिर कब तक लुटोगे************
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अपने पैर पर कुल्हाड़ी मरने वाली युक्ती को चरितार्थ होते हुए हम
अक्सर देखते हैं .इतिहाश से सबक ना सीखने की गलती दुहराते
हुए लोगो को हम रोज देखते हैं .अब पछताए क्या होत है का
मुहावरा कहते हुए हम लोगों को अक्सर सुनते हैं .समय -समय पर
समाचार पत्रों में,टी.वी. चैनलों में खबर आती है फला -फला कम्पनी
लोगों की मेहनत की जरूरतमन्दों की गाढ़ी कमाई जो उन्होंने अपना
पेट काटकर आड़े वक़्त के लिए ,बेटा -बेटियों के विवाह के लिए लेकर
अपने इलाज़ के लिए संचित कर रखी थी ,लालच देकर विभिन्न नामों से
चालू की गई कम्पनीयों के मालिको द्वारा लूट ली गयी ,लेकर रफूचक्कर
हो गये यह सिलसिला कब थमेगा .ऐंसा क्यों होता है ? इसके लिए हम
खुद ही जिम्मेवार हैं क्योंकि "लालच बुरी बला होती है ,जो ले डूबती है "
लोग समझते क्यों नहीं हैं .
गाँव -गाँव में शहरों में कदम कदम पर बैंको की शाखाएं खुली हुई हैं फिर
भ़ी लोग इनमे खता खोलकर अपनी रकम जमा नहीं करते अपने करीबी
रिश्तेदारों ,जो विभिन कम्पनियों में एजेंट ,प्रमोटर .प्रबंधक .के पद पर
कार्य कर रहे होते हैं के बहकाने मे आकर उनपर भरोसा कर अपना पैसा
लगते हैं जिसमे जीवन बीमा , और अधिक ब्याज का लालच होता है कम
समय मे अधिक रकम मिलने का लालच होता है जो धोखे का कारण बनता
है जिसकी बुनियाद झूठ पर आधारित होती है .ऐंसी कम्पनीयां समाचार
पत्रों में बड़े बड़े विज्ञापन देकर लोगो को सुनहरे सपने दिखती हैं भ्रमित
करती हैं बड़े बड़े दावे करती हैं बड़े भव्य आफिस खोलकर प्रभावित करती हैं
रिजर्ब बैंक लाएसेंस का उल्लेख कर जमा संग्रहण की अनुमती का दावा करती
हैं इनकी जाँच करने वाली एजेंसियों द्वारा प्रभावी कदम उठाने के प्रयासों की
जरूरत महसूस होती है सामाजिक संगठनों ,सामाजिक कार्यकर्ताओं ,प्रजातन्त्र
के ४थे स्तभ ,साहित्यकारों शासन प्रशासन के द्वारा जागरूकता लेन की आवश्यकता
है थोश अभियान चलाने कि जरूरत है .जब तक हम ऐंसे प्रयास नहीं करेंगे लोग
जागरूक नहीं होगे तब तक भले गरीब लुटते रहेंगे .लूटने वालों के हौशले बुलंद
होते रहेंगे चालक अपनी तिजोरियां भरते रहेंगे .अफ़सोस होता है लोग क्यों
भूल जाते हैं
"माखी गुड में गडी रहे ,पंख रहे लिपटाय,हाँथ मले और सर धुनें लालच बुरी बलाय "
लोग अपने पैरों पर खुद कुल्हाडी मारना कब छोड़ेंगे .मत भूलो ,खत्म करता है कौन
किसको इसमें होता है खुद का हाँथ ,फिर शासन प्रशासन स्तर पर लुटेरोंके खिलाफ
ठोस कदम उठाने की जरूरत है ,ऐंसा नहीं है उसका ध्यान इस ओर नहीं है बुराई को
जड -समूल खत्म करने के जरूरत है .
मुझे याद आती है १९६६ की घटना ,जब मैंने ११थ मेट्रिक ककी परीक्छा पास की थी
बाबूलालटाकीज के पास बिडिंग में मैंने इक नवकेतन पब्लिशर्स कम्पनी के विज्ञापन
के आधार पर सम्पर्ककिया आलीशान आफिस था .प्रबंधक को मैंने अपना परिचय
दिया आवेदन दिया ,मुझे इक फार्म दिया और भरने कहा मैंने पुचा काम क्या करना
होगा ?वेतन क्या मिलेगी ?प्रबन्धक ने बताया हमारी संस्था पब्लीकेशन का कार्य करती
हैं इक डायरेक्टरी निकल रही है ,एजेंटों को २००/ मासिक मिलेगा .अजेंतो कोविज्ञापन
कलेक्ट करना है ,इससे प्राप्त रकम कम्पनी के जालन्धर में कार्याय पैसा सीधे भेजना है
अपनी सेलरी काटकर.प्रबंधक ने बताया रायगढ़ में एजेंट की जगह खाली है आप चाहें तो
आवेदन कर सकते हैं मैंने पूछा आपकी कम्पनी का रजिस नम्बर क्या है ?बताया गया
रजिस .नम्बर की आवश्यकता नहीं है ..सोचता हूँ कहकर बैठ गया .मैंने देखा जो भ़ी
आया अपढ़ ,पढालिखा सबको यही कहा गया वगैर साक्छात्कार लिए सभी को ५००/
स्र्क्छा निधी लेकर एजेंट निउक्ती का आदेश दिया गया .मेरा माथा ठनका मैंने उव्कों से
चर्चा की सबने अनसुना कर दिया .इसके पश्चात शिटी-कोतवाली गया थानेदार को सब
बताया सुनकर बोला देख लेंगे ,पचे गये प्रश्नों का जवाब दिया .ऐना लगा पुलिस भ़ी उनसे
मिली हुई है पर सुबह शंका निर्मूल साबित हुई ,जब समाचार पत्र में खबर पढ़ा कि नवकेतन
पब्लिशर्स का कार्यालय सील कर प्रबन्धक को गिरफ्तार कर लिया गया .आगे कार्यवाही
जरी है .
मैंने अपने अनुभव को इक व्यंग कविता के रूप में लिखा "एक बेरोजगार की व्यथा "इसे
मैंने आकाशवाणी रायपुर भेजा बेह्द्खुशी जब इसे स्वीकार कर स्वयम पढ़े के लिए मुझे
आमंत्रित किया जिसका प्रसारण ८.५.१९७९ को हुआ " संयोग से मेरे पत्नी का जन्म दिन था'
जो आज भी प्रासंगिक है कुछ प्न्तीयाँ दे रहा हूँ
कल के इंतज़ार में हम
रात भर करवटें बदलते रहे .
ख़ुशी -ख़ुशी में
खुले के खुले रह गये किवाड़
सुवह -सुवह नीद लगी झुश गये चोर
चुराकर ले गये सारा सामान
हम अपना पीट रहे थे सर
कमरे में वहफुलपैंट नहीं था
जिसमे परिचय वाला कार्ड था
हमारा बन्त्ताधार था
मुहल्ले में मच गया हल्ला
लुट गया लल्ला
दिन भर हम
भगवन को फिरते रहे कोसते
भगवान् कुछ तो रहम करते
जब कुछ नहीं दे सके
फिर क्यों हो छीनते
दिन भर हम घुमे पागलों से
गये वहां
जहाँ मिले थे वह सज्जन
गये वहां
जहाँ उतरे थे वह सज्जन
खूब लगाया पता
कुछ नहीं हुआ हासिल
घर के बुध्धू घर को आये
अपना मनहूस चेहरा लटकाए
मुहल्ले में हमने
किसी से नहीं की कोई बात
कारण सांत्वना के शब्द
चुभते हैं कील से
कैद हो गया कमरे में जाकर
दोस्तों ने पड़ोसियों ने
सम्पर्क करने की ,
की कोशिश बहुत
मगर गईं सब व्यर्थ .
सुबह जब हुई
दे गया अख़बार ,अखवार वाला
उठाया देकने फिर
विज्ञापन वांटेड का .
देखा मुख प्रस्ट पर
उन्ही सज्जन का फोटो छपा था
जिनने हमे कल बुलाया था
साथ में बड़े बड़े शब्दों में
शीर्षक छपा था
बेरोजगारों को ठगने वाला
इक अंतर -रास्ट्रीय गिरोह का सरगना
पुलिश कई गिरफ्त में
हम पड़ गये सकते में
काटो तो खून नहीं
अब समझ में आया
चोर बनकर आये थे भगवान्
इक नेक मेहनती उवक को बचाने
मरने वाले से बचाने वाला
बड़ा होता है
अब समझ में आया
वरना अपना कहीं नहीं था ठिकाना
दे गया अख़बार ,अखवार वाला
उठाया देकने फिर
विज्ञापन वांटेड का .
देखा मुख प्रस्ट पर
उन्ही सज्जन का फोटो छपा था
जिनने हमे कल बुलाया था
साथ में बड़े बड़े शब्दों में
शीर्षक छपा था
बेरोजगारों को ठगने वाला
इक अंतर -रास्ट्रीय गिरोह का सरगना
पुलिश कई गिरफ्त में
हम पड़ गये सकते में
काटो तो खून नहीं
अब समझ में आया
चोर बनकर आये थे भगवान्
इक नेक मेहनती उवक को बचाने
मरने वाले से बचाने वाला
बड़ा होता है
अब समझ में आया
वरना अपना कहीं नहीं था ठिकाना
लोग पिछली घटनाओं से सबक क्यों नहीं लेते
समय रहते शासन प्रासशन ऐंसे संस्थानों की जाँच
करवाए तो लोगों को लूटने वाले धोकेबजों से लोगों को
बचाया जा सकता है ,समाचर पत्र इसमें अहम भूमिका
निभा सकते हैं जैंसा गर्भास्य निकलने के मामले में हुआ है
साशन ने कड़े कदम उठाये हैं .लोगों में जाग्रति लाने की
जरूरत हैपर सबसे ज्यादा जरूरत है खुद को सतर्क रहने
की लालच से दूर रहने की बूँद - बूँद से घड़ा भरता है इसे
समझने की पैसा बैंक से ज्यादा कहीं सुरक्छित कहीं नहीं हो
सकता इसे गांठ बांध कर रक लें . .
समय रहते शासन प्रासशन ऐंसे संस्थानों की जाँच
करवाए तो लोगों को लूटने वाले धोकेबजों से लोगों को
बचाया जा सकता है ,समाचर पत्र इसमें अहम भूमिका
निभा सकते हैं जैंसा गर्भास्य निकलने के मामले में हुआ है
साशन ने कड़े कदम उठाये हैं .लोगों में जाग्रति लाने की
जरूरत हैपर सबसे ज्यादा जरूरत है खुद को सतर्क रहने
की लालच से दूर रहने की बूँद - बूँद से घड़ा भरता है इसे
समझने की पैसा बैंक से ज्यादा कहीं सुरक्छित कहीं नहीं हो
सकता इसे गांठ बांध कर रक लें . .
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