Monday, 21 September 2015

*************सिहर उठता हूँ सोच कर !**********
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उदास चेहरे पै आ गई रौनक हमारे उन्हें देखकर
होश गवा बैठे हम पल - भर उनको निहार कर
घर के रहे न घाट के हम हँस कर उनसे बात कर 
घर का रास्ता भूल गए हम नाजनीन की याद कर
इरादे समझ सके ना हम उनकी मासूमियत को देखकर
हम अपना सर्वस्त्र लुटा बैठें साथ एक पल गुजार कर
भूल हुई भारी ऐ -खुदा माफ़ कर मुझपे अहसान कर
महगा बड़ा पड़ा मुझे ये सफर सिहर उठता हूँ सोचकर
---------------------रमाकांत बड़ारया "बेताब" दुर्ग
(२१-९-२०१५बैठे ठाले )
*********रौनक गायब होनी ही थी***********
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कल तक  तो  साहब के चेहरे पर बेहद रौनक थी
कल तक तो  साहब के चेहरे पर लाली छाई थी

आज  साहब  के  चेहरे  पर  मायूसी  का  डेरा है
आज हुआ ऐसा क्या साहब के माथे पर चिंता थी

कल तक साहब के घर महफ़िल थी जमती जमकर
आज  साहब  के घऱ की  रौनक बिलकुल गायब थी

शह  और  मात  का  गंदा  खेल बहुत खेला साहब ने
इक दिन साहब  के घर की रौनक गायब होनी ही थी
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============रमाकांत बड़ारया  "बेताब" दुर्ग






Tuesday, 1 September 2015

********************यही है इतिहास**************
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दिन पर दिन
गुजरते चले गए
समय बीत गया 
समय जीत गया
हम हार गए
बहुत चले मगर
जहाँ के तहँ रहे
कहते हैं सयाने
कहें अगर बड़े तो मानें
हम कहाँ मानते हैं पर
हमे हमारा रास्ता ही
सही और
सफल होने वाला दिखता है
जब वास्तविकता
सामने आती है तो बंधू
धरातल पर नज़र आते हैं
कहीं प्यार तमाशा है
कहीं प्यार कहानी है
कहीं हंसती है
कहीं रोती जवानी है
फिर भी
रहस्य और रोमांस
इसके पीछे
भाग रहा है नादान
क्या है काम का
और क्या है बे-काम
समझ नहीं पा रहा नादान
समझ अगर जाये तो
है वह इंसान
अगर ना समझे तो
समझो है वह हैवान
समझ यही तो है
जानवर से इंसान की पहचान
तीन किस्तों में
अपनी जिंदगी
जी रहा है आदमी
बचपना -जवानी और बुढ़ापा
बचपने पर जवानी आती है
जवानी पर बुढ़ापा
जवानी वक़्त को
वश में करने की
कोशिश करती है
मगर वक़्त
जवानी को वाश में कर लेता है
आदमी मजबूर हो जाता है
फिर गुजरा हुआ
ज़माना याद आता है
मानव जीवन
चिंगारी की तरह होता है
जो पल भर के लिए चमकती है
फिर भुझ जाती है
मानव जीवन
एक सरिता की तरह है
जो टेढ़ी-मेढ़ी चलती है
कहीं श्रजन करती है
कहीं करती है विनाश
यही है इतिहाश
कहीं जन्म की खुशी है
कहीं मृत्यु से शोक
कहीं शादी की रश्में हैं
कहीं चिता की तैयारी
कहीं कोई
जीवन साथी की तलाश में
कहीं कोई
जीवन साथी से छुटकारा पाने
प्रयासो में रत
कहीं दो प्रेमी
एक होने प्रयत्नशील
कहीें दो भाई
जुदा होने की तैयारी में
कोई नव-निर्माण में व्यस्त
कोई कर रहा
वि -ध्वंशक की तैयारी
क्या हम आगे बढ़ रहे हैं
या जा रहे सदियों पीछे
कह नहीं सकते बंधू
यहां कौन क्या
क्या सपने ग़ढ रहा है?
------रमाकांत बड़ारया "बेताब " दुर्ग
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**********२२-११-१९७६*************
**************माखौल उड़ा रहे थे *****************
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हम तो शोषित और पीड़ितों की बात कर रहे थे
वो अपने स्वार्थ मैं लिप्त हो लोगों को डरा रहे थे
उनका इतिहास उठा के देख लो समझलो खूब
अपने स्वार्थ के लिये देश को लूट रहे-लूटा रहे थे
शांतीदूतों परबरसाने लाठियां दामन में जिनके दाग
चापलूस यहां हंसकर- उनके हौसले बढ़ा रहे थे
खुलकर बात कहने का जिनने समय दिया कभी नहीं
अपनी बात को ताल ठोक कर कहो जुमले चला रहे थे
हाथ में जब भी किसी के यहां सत्ता रुपी ताकत नही रही
"बेताब" साठ-गांठ कर लोग अपना माखौल उड़ा रहे थे
----------------------रमाकांत बड़ारया "बेताब " दुर्ग ----------------