Monday, 17 August 2015

*********बड़ा प्र्श्न चिन्ह लगती है *******
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दो साहित्यकार मित्र 
आपस में बतिया रहे थे 
एक साहित्यकार 
किसी गलतफहमी का
शिकार होकर
दूसरे साहित्यकार से कह रहा था
बंधू !
कुछ लोगों को
बड़ी गलत फहमी है
उन्होंने मुझे अपनी
साहित्य समिती का
पदाधिकारी बनाया है
शायद वो ये नहीं जानते
मैं !
किसी की बदौलत नहीं
खुद अपनी क़ाबलियत से
चुना गया हूँ !!
दूसरा साहित्यकार
चुपचाप सुन रहा था !
जब सहन से बाहर हो गया
तब बोला बंधू !
आप ऐसा क्यों कह रहे हैं
जबाब में,
पहले वाले साहित्यकार ने कहा
मैंने ऐसा सुना है !
तब दूसरे साहित्यकार ने कहा
हम ही कहते हैं
सुनी सुनाई बातों पर
विस्वास नहीं करना चाहिए
कान का कच्चा
कभी भी
किसी का हितैसी नहीं हो सकता
हम ही कहते हैं
शक की कोई दवा नहीं होती
तुम साहित्यकार होकर
शक के आधार पर ऐसा कहते हो
खुद को कान का कच्चा
साबित करते हो
क्यों जहर पीते हो
साहित्यकार की गरिमा को
क्यों कम करते हो !
अपनी क़ाबलियत पर
क्यों कालिख लगते हो
आपकी क़ाबलियत पर शक होता है
साहित्यकार का फर्ज है
शक करने वालों को
नसीहत लगाये
अपने ज्ञान की गंगा से
निर्मल मन बनाये
आप तो खुद ही भटक गए हो
दूसरों को क्या रास्ता दिखाओगे
और गौर से सुनो
किसी के चुनाव मैं
क़ाबलियत मायने नही रखती
अक्सर नाकाबिल
पद हथिया लेते हैं
या किसी को सबक सिखाने
चालक
दूसरों को मोहरा बना लेते हैं
या रबर स्टेम्प को ही
आगे कर खड़ा कर
चुनाव जित्वा देते हैं
कोई अगर ये कहता है
की उसने
तुम्हे पदासीन करवाया है
तो क्या गलत कहता है
जब कोई
किसी प्रतयासी को
खड़ा नही करेगा
उसका समर्थन नहीं करेगा
उसके पक्ष मैं
वोट नही करेगा
तो वह जीतेगा कैसे !!
आपका दोष नहीं है
कुर्सी और पद की महिमा ही ऐसी है
अच्छे - अच्छों के
आचरण मैं खोट ला देती है
घमंडी सक्की
हितैषियों को भी
दुश्मन बना देती है
मैं नहीं कह सकता
आपका मामला क्या है
इतना तय है
आपकी सोच
आपको अविस्वस्नीय बनाती है
आपके साहित्यकार होने पर
बड़ा प्रश्न चिन्ह लगती है !!
==========रमाकांत बड़ारया "बेताब"

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