Monday, 17 August 2015

*****प्रसिद्धी सर पर ज्यादा देर नही रहती ********
++++++++++++*सार्थक पहल ++++++++++++
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उन साहित्यकार के लिए लिए जो साहित्यक कार्यक्रम 
आयोंजन के निमंत्रण पर स्वार्थ सिद्दी( रेल किराया , 
आसन ,लिफाफा संभावित ) का आस्वासन न होने पर
भड़क गए और तमीज सीखने का तीर चला दिया .एक
कहावत को हर कोई जनता है प्रचलित है
**********डायन भी एक घर छोड़ती है **************
आम आदमी इसे जनता है आसमान मे खोखली ख्याति
के नशे मैं चूर वे साहित्यकार भले ही न समझें आम आदमी
इसे भी अच्छी तरह जनता है
**********नशा ,लालच ,क्रोध नाश की जड़ होती है ******
भले ही एक अहंकारी साहित्यकार आँखें होकर भी अंधे का
पाठ करते हुए अशोभनीय हरकत करने लगे ,नजर आये तो
संगवारी के १२-४-१५ बिलासपुर के आयोजन परिचर्चा का विषय
**********साहित्य की दिशा दायित्य और चुनौतियां ***********
सार्थक लगता है क्योंकि ये निश्चित ही साहित्यकार की भूमिका
पर उसकी मानसिकता,उसकी सक्रियता,निष्क्रियता पर,और उसकी
रचनात्मक सोच पर निर्भर करता है .हहम संगवारी जन निस्वार्थ
साहित्य,संस्कृति ,कला को उन्चैयों पर ले जा रहे हैं देश के नामी
साहित्यकार हमारा हौसला बढ़ाने हमसे जुड़ रहे हैं कार्यक्रमों मैं आ
रहे हैं हमारे अपने कुछ अहंकारी साहित्यकार जाने किस मिटटी के
बने हैं अपने आगे दूसरों को बौना समझ रहे हैं .पर वो भूल जाते हैं
छोटा ही चलकर महान होता है ,काम से ही नाम होता है उनको बस
छोटे मुह बड़ी बात किसी शायर ने कहा है
,,***********प्रसिद्धी किसी के साथ ज्यादा देर तक नहीं रहती *******
************ बड़ी मंज़िल हमेशा ही खतरे मैं रहती है **********
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