Wednesday, 26 August 2015

************************************ श्री हरिशंकर परसाई ****************************************
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      श्री हरिशंकर परसाई हिंदी साहित्य जगत की एकमहान विभूति !व्यंग के बादशाह के रूप में अपनाविशेष स्थान रखते हैंश्री हरिशंकर परसाई जी का जन्म 22.8.1924.कोइटारसी के पास होशंगाबाद जिले के ग्राम -जमानीमें हुआ .1936 -1937 मैं प्लेग फैला इसी दौरान आपकी माँ का देहांत हो गया . लगभग  5 साल केबाद पिता ने भी अंतिम साँस ली .भाई -बहनों में 
सबसे बड़े ,खूब पढने वाले ,खूब खेलने वाले औरखूब खाने वाले थे मस्त मौला व्यंग के बादशाह श्रीहरिशंकर परसाई जी .
गाँव में आरंभिक शिक्षा हासिल करने के बाद आपनागपुर आ गये .यहाँ आपने नागपुर विश्वविद्यालयसे एम ए हिंदी की परीक्षा पास की .अपने गर्दिश केदिनों का उल्लेख आपने बड़े ही अनोखे अंदाज़ मेंअपने एक रचना "गर्दिश के दिन"में किया है .बिना
टिकिट नौकरी की तलाश में होशंगाबाद, इटारसी',टिमरनी ,खंडवा खूब भटके .जंगल विभाग में कुछदिन नौकरी की ,कुछ दिनों तक अध्यापन कार्य केसाथ -साथ लेखन कार्य किया . नौकरी रास नहींआयी .नौकरी छोडकर स्वतंत्र लेखन कार्य प्रारंभ
किया और इसी में रम गये .इसके पश्चात नर्मदानगरी जबलपुर आ गये .जबलपुर आकर परसाई जी ने एक साहित्यक पत्रिका
"वसुधा "का प्रकाशन प्रारंभ किया जो उनके लिए घाटेका सौदा रहा .आर्थिक क्षति की वजह से पत्रिका काप्रकाशन बंद करना पड़ा .जिससे उनको गहरा सदमालगा। . .अपने लेख "गर्दिश के दिन " में उल्लेख करते हुए श्रीपरसाई जी कहते हैं "गर्दिश कभीथी अब नहीं है ,अबआगे भी भी नहीं होगी ------यह गलत है "मैं निहायतबैचैन मन का आदमी हूँ .मुझे चैन कभी मिल ही नहीं सकता .इसीलिये गर्दिश ही नियति है।सही बात यह है कोइ दिन गर्दिश से खाली नहीं है औरन ही कभी गर्दिश का अंत ही होना है यह और बात है किशोभा के लिए कुछ अच्छे किस्म की गर्दिशें चुन ली जाएँ .मेरे जैसे लेखक की एक गर्दिश और है भीतर में जितनाबबंडर महसूस करता हूँ उतना शब्दों मैं नहीं आ रहा .
हरिशंकर परसाई नाम का आदमी
जो हँसता है
जिसमे मस्ती है
जो ऐसा तीखा है
कटु है
यह कब गिरा
यह कब उठा
कैसे टूटा
यह निहायत कटु
निर्मम और धोबी पछाड़ आदमी है "
परसाई जी कहते हैं -
मैंने तय किया ,
परसाई डरो मत किसी से
डरे की मरे .
सीने के उपर कडा कर लो
भीतर तुम जो भी हो .
     परसाई जी कितनी सादगी साहस से बड़ी बातकहते हैं-जरा गौर करें --दिखाऊ सहानुभूति से मुझे बेहद नफरत है
अभी भी दिखाऊ सहानुभूति रखने वालों कोचांटा मार देने की इच्छा होती है जप्त कर जाता हूँवरना कई शुभ-चिंतक
 पिट जाते .
परसाई जी की साहित्यिक विशेषताएं एवं भाषा शैली
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परसाई जी के लेखन की यह विशेषता है की उन्होंनेकेवल विनोद या परिहास के लिए नहीं लिखा .उनके लेखन में वैज्ञानिक जीवन द्रष्टी पाई जाती है .जोसमाज में फैले भ्रस्टाचार ,ढोंग ,अवसरवादिता औरकुप्रविर्तियों पर प्रहार करती नजर आती है .
लगातार खोखली होती जा रही हमारी सामाजिक औरराजनैतिक- व्यवस्था मैं पिसते मध्यम वर्गीय मन की सच्चाइयों को उन्होंने बहुत ही निकटता से पकड़ा है .परसाई जी की भाषा शैली में खास किस्म का अपनापनहै, जिससे पाठक यह महसूस करता है मानो कि लेखकउनके पास ही बैठा हो .पाखंड ,बे-इमानी ,आदि पर परसाई जी ने अपने व्यंगों के माध्यम से करारी चोट की है .वे बोलचाल की सामान्यभाषा का प्रयोग कर चुटीला व्यंग करने में बड़े माहिर थे .बेजोड़ थे ,बेजोड़ हैं .परसाई जी का कोई सानी नहीं है .श्री हरिशंकर परसाई जी की भाषा में व्यंग की प्रधानता हैइनकी भाषा समन्य्वी संरचना के कारण विशेष क्षमता रखती है .परसाई जी की कलम रुपी तीर से निकले एक-एक शब्द में व्यंग के तीखे पन को देखा जा सकता है .
परसाई जी ने अपनी रचनाओं में लोक प्रचलित हिंदी केशब्दों के साथ उर्दू और अंग्रेजी के शब्दों का खुलकरप्रयोग कियाहै.आप हिंदी के पहले रचनाकार हैं जिन्होंने व्यंग कोएक विधा के रूप मैं सम्मानजनक स्थान दिलवाया .व्यंगको शिखर पर पहुंचाकर ही दम लिया लिया इसके लि y साहित्य जगत उनका हमेशा आभारी रहेगा .श्री हरिशंकर परसाई जी अपने पाठकों के जबाब अपने एकनियमित कालम "पूंछिये परसाई से "के माध्यम से दियाकरते थे जो की दैनिक -देश बंधू समाचार पत्र में जबलपुर
और रायपुर से प्रकाशित होता था .बहुत ही लोकप्रिय हुआ .*श्री हरिशंकर परसाई जी की कुछ अनमोल कृतियाँ **
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आपके अनेक संस्मरण ,कहानी संग्रह,उपन्यास ,निबंधसंग्रह व्यंग प्रकाशित हुए जो अत्यंत लोकप्रिय हुए जो
निम्म्क्नुसार हैं .
1 .-हम एक उम्र से वाकिब हैं --- 2 .-जाने पहचाने लोग
3 .-भोलाराम का जीव -- 4-रानी नागफनी की कहानी
5--ज्वाला और जल -- -6- तट की खोज
7- हँसते हैं रोते हैं -- 8- जिनसे उनके दिन फिरे
9--तब की बात और थी -- 10--भूत के पॉँव पीछे
11-बे-ईमानी की परत -- 12-पगडंडियों का ज़माना
13--शिकायत मुझे भी है -- 14--सदाचार का ताबीज
15 --प्रेमचंद के फटे जूते --16--मति कहे कुम्हार से
17--काग -भगोड़ा --18 -वैष्णव की फिसलन
19--तिरछी रेखाएं -- 20-ठिठुरा हुआ गणतंत्र
21 --विकलांग श्रर्द्धा का दौर । --22-ऐसा भी सोचा जाता है
23 दो नाक वाले लोग 24- तिरछी रेखाएं
25 आवारा भीड़ के खतरे 26 बस की यात्रा
27भीड़ और भेदिये -28निठल्ले की डायरी
29 तुलसीदास चन्दन धिसे -30 परसाई रचनावली
31-अपनी-अपनी बीमारी 32सुनो भाई साधो
33-पाखंड का आध्यात्म 34-----------------
साहित्य -सेवा के लिए जबलपुर विश्वविध्यालय के द्वाराआपको डी .लिट् की मानद उपाधी प्रदान की गयी .आपकी रचनाओं का लगभग सभी भारतीय भाषओं एव अग्रेजी मैं अनुवाद किया गया है मलयालम मैं सर्वाधिक 4 पुस्तके .हैंश्री हरिशंकर परसाई जी को 1982 मैं उनके व्यंग "विकलांग श्रद्धा का दौर" के लिए साहित्य -अकादमी के पुरस्कार से सम्मानित किया गया .इस महान साहित्यकार ने 10.8.1995को जबलपुर में अंतिम साँस ली .साहित्य -जगत ,पाठकों के बीच अपनी धारदार कलम से उपजे साहित्य के माध्यम सेहमेशा अपनी उपस्थति का अहसास कराते रहेंगे .प्रेरणा के श्रोत बनेगे .
********** "विकलांग श्रद्धा का दौर" के कुछ अंश **************
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श्रद्धा का यह कोइ दौर है?देश में जैसा वातावरण है ,उसमे किसीको भी श्रद्धा रखने मैं संकोच होगा .श्रद्धा पुराने अखवार की तरह रद्दी में बिक रही है .विस्वास की फसल को तुषार लग गया है .इतिहाश में शायद कभी किसी जाति को इस तरह श्रद्धा औरविस्वास से हीन नहीं किया गया होगा .जिस नेत्रत्व पर श्रद्धा थी ,उसे नंगा किया जा रहा हैजो नया नेत्रत्व आया हैवह उतावली मेंअपने कपडेखुद उतर रहा है।कुछ नेता तो अंडर -विय र में हैं .कानून से विस्वास उठ गयाहै,अदालत से विस्वास छीन लिया गया है।बुद्धिजीवियों की नशलपर ही शंका की जा रही है .डाक्टरों को बीमारी पैदा करने वालासिद्ध किया जा रहा है .कहीं कोइ श्रद्धा नहीं ,विस्वास नहीं।मैं अपने श्रद्धालुओं से कहना चाहता हूँ "चरण छूने का मौसम नहीं है लात मारने कामौसम है .मारो एक लात और क्रन्तिकारीबन जाओ ".************************************हरिशंकर परसाई .
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मानो ऐसा लगता है यह व्यंगआज की परिस्थतियों से दुखीहोकरलिखा गया हो ,जिसकी कल्पना परसाई जी ने वर्षों पहले कर लीहो ऐसे त्रिकालदर्शी साहित्यकार को शत-शत नमन। '
न वक़्त रहता है न इन्सान रहते हैं ,
कहने को यहाँ किये कुछ काम रहते हैं"
जीवन भर के संघर्षों में प्रेरणा के जो श्रोत्र रहे हैं
मैं कैंसे भुला दूं उनको रमाकांत तुम्हीं बोलो
साहित्य जगत श्री परसाई जी के योगदान को कभी नहीं भुलासकता आपने वर्ष 1962 के विश्व शांति सम्मेलन रूस मैं भारतीय
प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया .एक साहित्कार के लिए यह बड़ासम्मान था .श्री परसाई जी के बारे मैं जितना गुणगान किया जाये कम है गहराईमें जितना उतरो उनके खजाने से एक नया मोती निकलता है .उनकी एक नई मारक शक्ति श्रोत का पता चलता है। हमे ऐसे प्रखर साहित्यकार पर गर्व है परसाई जी का साहित्य बहुत प्रेरणा दाई हैरास्ता दिखाने वाला है परसाई जी पर निम्म पन्तियाँ शत प्रतिशतखरी उतरती हैं .
*************गर्दिश ,मुश्किलों में आदमी निखरता है ************.
*************आग में तपकर जैसे कुंदन निखरता है *************
श्री हरिशंकर परसाई जी पर ये पन्तियाँ कितनी खरी उतरतीं हैं इसकोआपके शुभचिंतक अनुसरण करने वाले ,उनको करीब से जानने वालों से ज्यादा बेहतर और कोई नहीं जनता .इनकी रचनाओं को जिन्होंनेनहीं पढ़ा ,वे बहरीन ,और लाजवाब रचनाओं से वंचित हैं.अवस्य पढ़ेंमनन करें . पाठको से अनुरोध है की परसाई जी के सम्बन्ध में कोइ और रचना धर्मिता से     जुडीरोचक,जानकारी ,ससंस्मरण हो तो अवस्य हीबांटे .!-----------स्वश्री हरिशंकर परसाई जी के बारे में मैंने जितना जाना
****************************************************************************************************88रमाकांत बड़ारया -दुर्ग 

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