Friday, 21 August 2015

***********संघर्ष विजय का दुहराता हूँ मैं *********
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कदम  से  कदम  मिलाकर  सुबह  के  साथ  चलता हूँ  मैं
उम्मीद के साथ मंज़िल पर पहुँच कर डालेंगे पड़ाव  हैं हम .

हम  भी किसी से कम नहीं  बार -बार  विश्वासव  दिलाता  हूँ
नव अगर हमको डुबाये तैरकर निकलने का दम रखते हैं हम

कदम  से  कदम  मिलाकर  सुबह  के  साथ  चलता हूँ  मैं
उम्मीद के साथ मंज़िल पर पहुँच कर डालेंगे पड़ाव  हैं हम .

हम  भी किसी से कम नहीं  बार -बार  विश्वासव  दिलाता  हूँ
नव अगर हमको डुबाये तैरकर निकलने का दम रखते हैं हम

रह  सकेंगे  आप  कब  तलाक पानी में मगर से बैर मोल  लेकर
लोगों को हर जगह बस यही बात दुहराते हुये अक्सर पता हूँ मैं  .

मुठियों में कैद होकर चाँद लोगों की रह सकेगी स्वतंत्रता कब तक
लावा बनकर बह निकलेगी एक दिन आवाज़ बुलंद करते जाता हूँ मैं

अतियों  की आंधी में हरदम साहस से घुस टकरा जाया करता  हूँ
 बार -बार पराजय मिलने  पर भी  संघर्ष विजय का दुहराता हूँ  मैं

लकड़ी से निकलता है धुआं जब तक संग अनेको लोगों को पाता हूँ
सुलगते -सुलगते  आग  मगर अक्सर खुद को   अकेला पाता हूँ मैं

हर बार कुछ न कुछ किया करता हूँ कुछ करने न हो ऐसी बात नहीं
जुल्मों को नहीं सह सकता कदम-कदम चुनौतियाँ खड़ी करता हूँ मैं .

---------------------------रमाकांत बड़ारया "बेताब " दुर्ग ---------------
                                 -(रचनाकाल -३-५-१९७८० )
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