Monday, 12 April 2021

 काव्य कृति

-"क्रांतिदूत "(जय प्रकाश नारायण )

कवि रमाकांत बड़ारया -दुर्ग 

    प्रकाशक

अंजुमन प्रकाशन 

प्रयागराज  (उत्तर प्रदेश )

iiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiii

-----जमुना प्रसाद कसार दुर्ग ------

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी / साहित्यकार 

     (((((((भूमिका से ))))))))

----------------पठनीय और विचारणीय भी ---------------

         कवि रमाकांत बड़ारया की यह प्रथम काव्य कृति है । जय प्रकाश नारायण एक अबूझ पहेली से कम नहीं भावुक,संवेदनशील,क्रांतिकारी विचार धारा रखने वाले ,संघर्षशील,लोकनायक के साथ कदम ताल करना  बहुत ही दुस्कर कार्य है। कवि रमाकांत बड़ारया ऐसे महामानव  श्री जयप्रकाश  नारायण  जी  की सरलता को समझाने का प्रयास अपनी काव्य कृति  "क्रांतिदूत "  के माध्यम  से किया है । जो कि सराहनीय है। अपनी इसी बात को साबित करने के लिए ही कवि ने श्री जयप्रकाश नारायण जी की लोकतंत्र में अडिग आस्था अदम्य साहस ,और जुझारूपन के  बल पर लक्ष्य तक पहुंचने वाले श्री जयप्रकाश नारायण जी को अम्रर  करने के लिए  ''क्रांतिदूत ''  की रचना की है । कवि ने लोकनायक श्री जयप्रकाश नारायण जी के द्धारा  विरद्धावस्था  में रहते हुए ताकतवर,निरंकुश , तानाशाह के  विरुद्ध समग्र- क्रांति की अगुवाई को चित्रण करके वर्तमान पीढ़ी को यह सन्देश  देने को प्रयास किया है , किव्यक्ति चाहे कितना भी ताकतवर ही क्योँ हो  ,अगर ओह अन्याय  करता है ,जुल्म धाता है ,अनुचित कदम उठाता है स्वार्थ में अंधा होकर तानाशाही पर ुइटर आता है ,आतंक और दमन के बल पर सत्ता के मद में चूर होकर जनता के मौलिक अधिकारों को हनन करता है ,लोगों के जीवन से खिलवाड़ करता है। तो उसके विरुद्ध भी संघर्ष को शंखनाद करने में घबराने की  जरूरत नहीं है। मैंने कवि रमाकांत बड़ारया को यह कहते हुए कई बार सूना है ''अन्याय  अगर होता कहीं हो ,याद  रख्खो न ड्रॉ लड़ो। '' मैंने कवि को यह कहते हुए भी की बार सुना है ''दिन के आते देर न लगती ,दिन के जाते देर नहीं। अन्याय न क़र अन्यायी टिकता ज्यादा देर नहीं '' इसी भावना से ओतप्रोत है  काव्य कृति '' क्रांतिदूत ''जयप्रकाश नारायण। कवि रमाकांत बड़ारया  ने समग्र  लोकनायक श्री जयप्रकाश नारायण जी को न केवल चित्रित किया है वरन  ऐसा प्रतीत होता है , आपातकाल से आहत होकर ही श्री जयप्रकाश  नारायण जी  को  केंद्र में रखकर ''क्रांतिदूत '' काव्य -कृति के माध्यम से  अपना  आक्रोश व्यक्त किया है ।  कवि रमाकांत बडारया कई यह काव्य कृति  ''क्रांतिदूत '' जयप्रकाश नारायण  पठनीय तो है ही ,विचारणीय भी है। गद्ध और पध दोनों विधाओं में लेखन का कार्य करने वाले कवि रमाकांत बड़ारया में सत्य को प्रभावी ढंग से पेश  करने की अद्भुत क्षमता है। जिस लगन से काव्य नायक का चयन किया उसी दक्षत,और लगन के साथ उसका श्रजन भी किया है जोसराहनीय है।कवि कहते हैं एक दिन श्री जयप्रकाश नारायण मेरे सपने में आकर बोले रमाकांत तुमने आपातकाल को बड़े करीब से देखा है आपात काल पर लिखे क्यो नहीं यहीं से शुरूआत होती है १.१० १९७८ से काव्य कृति ''क्रांतिदूत '' जयप्रकाश नारायण की।  

            कवि रमाकांत बड़ारया लिखते हैं पत्नी प्रभा जी की मिर्त्यु  के बाद श्री जयप्रकाश नारायण जी को कुछ सूझ नहीं रहा था। इसी  वक़्त उनका ध्यान गुजरात के छात्र आंदोलन की ओर गया ,तब उन्होंने छात्रों के नाम एक अपील ''लोकतंत्र के लिए युवा '' जारी की जिसका छात्रों बड़ा असर हुआ । छात्रों को एक मार्गदर्शक की तलाश थी जो उन्हें जयप्रकाश नारायण जी के रूप मैं मिला। कवि लिखते हैं '' कहते थी युवक श्री जयप्रकाश नारायण जी ने ही हमे दिखाया है रास्ता। बे हिचक कहा जयप्रकाश नारायण ने ,भटकने लगते थे जब जब युवक करता था उनका मार्गदर्शन मैं।बाद मैं यह  आंदोलन विहद नवनिर्माण आंदोलन बना  ।  गुजरात की तर्ज पर महंगाई व् ब्रस्ताचार के विरुद्ध जब बिहार के छात्रों ने आंदोलन शुरू किया तो छात्रों के निवेदन पर इसमें श्री जयप्रकाश नारायण जी ने प्रभावी भूमिका अदा की। बिहार के छात्र आंदोलन की   विशेषता थी इसमें जनप्रतिनिधियों के विरुद्ध जमकर नारे लगे ''काम नहीं क़र सकते तो गद्दी छोडो ।   बिहार  के छात्र आंदोलन ने बाद मेंव्यापक  रूप ले  लिया ,जिसकी आग सारे देश में फ़ैल गईं। लोकनायक श्री जयप्रकाश नारायण जी ने बिहार के छात्र आंदोलन को समग्र क्रांति को नाम दिया। इसके मायने समझाया। जन भावना को उल्लेख करते हुए कहा -''सम्पूर्ण क्रांति हमारा नारा है ,भावी इतिहास हमारा है ''आगे कवि लिखते हैं ''जब चली जयप्रकाश कि आंधी ,घबरा  गईं इंदिरा गाँधी '।  बिहार  में श्री जयप्रकाश नारायण  के बढ़ते प्रभाव  तथा  लोक प्रियता   के कारण वे शासन के कोप का भाजन बने।  कवि ने बिहार के  आंदोलन कि उग्रता को दिल दहला देने वाला वर्णन किया है  जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। 

शुरू हो गया यहां धुआंदार लाठी प्रहार 


लक्ष्य थे लोकनायक जयप्रकश 

बरस पड़ी उन पर दना -दन लाठियां 

छोड़े गए गोले अश्रू गैस के 

गिर पड़े लोकनायन खाकर चोट। 

पटना बिहार में ४ नवंबर १९७४ को हुए अमानुषिक ,बर्बर लाठी चार्ज व् दमन के बाद भी शांति के पुजारी लोकनायक श्री जय प्रकाश नारायण ने लोगों को शंदेश दिया ''हमला चाहे जैसा भी हो ,हाँथ हमारा नहीं उठेगा ''उनकी प्रतिकिरिया थी ''विनाश काले विपरीत बुद्धि ''सबसे तीखी प्रतिकिरिया  कवि श्री गोपालदास नीरज कि थी  कहा-

''लाठी जो बरसी है

 जयप्रकाश पर बिहार में

किसी को लगे न लगे 

बनकर  कलंक लगी है 

माथे पर मेरे देश के ''

 श्री जयप्रकाश नारायण की एक ही आवाज पर लाखों लोग इकट्ठा होने लगे। इसके बाद कवि ने १९७१ के आम चुनाव में  रायबरेली से श्रीमती इंदिरा गांधी के हांथों पराजित प्रत्यासी श्री राजनारायण द्धारा उनके निर्वाचन को चुनौती देने वाली चुनावी याचिका का उल्लेख किया है जिस पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने श्रीमती इंदिरा गाँधी को भ्र्ष्टाचार का दोषी  मानते हुए उनका चुनाव अवैध घोषित क़र दिया था ,इतना ही नहीं ६ वर्षों तक चुनाव लड़ने पर पावंदी लगा दी  गई थी।  फिर भी उन्होंने प्रधान मंत्री को पद नहीं छोड़ा। जिसने भूचाल ला दिया। विरोधियों ,तथा उनके ही दल के बड़े नेताओं ने इसकी मांग तेज क़र दी।श्रीमती इंदिरा गाँधी ने अपनी कुर्शी बचाने संबिधान में शंशोधन  किये ,कला क़ानून  मीसा लगा दिया २५ जून  १९७५ को अर्ध रात्री के वक़्त देश में आपातकाल लगा दिया । मीसा कानून के अंतर्गत रातों रात  जयप्रकाश नारायण के साथ देश के तमाम   विरोधी छोटे बड़े नेताओं को  रातों रात जेलों  में ठूंस दिया गया देश भर में लाखों गिरफ्तारियां की गयीं  । प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई ,अदालतों के द्वार सदा के लिए बंद क़र दिए गए। लोगों के मूलभूत अधिकार छीन लिए गए। युवकों की जबरन नसबंदी की गई ।  दूर- दूर तक कोइ पूंछने वाला कोइ नहीं था । जिसने  विरोध किया वो फिर देखने नहीं मिला। मनमानई  , अत्याचार , दमन का  तथा क़ानून मीसा के दुरूपयोग  का कवि रमाकांत बड़ारया  ने बड़ी दक्षता से वर्णन किया है। १९ महीनो  की गहन  यातनाओं के बाद  के लोगों  को जेलों से रिहा किया गया । श्री  जयप्रकाश नारायण ''क्रांतिदूत '' बनकर उभरे ।   इन सभी दुष्परिणामों की वजह से सारे दलों से मिलाकर न  केवल जनता पार्टी आतित्त्व मैं ही नहीं आयी वरनभारत ही जनता ने १९७७  मैं हुए आम चुनाव में  सत्ता की बागडोर जनता  ने जनता पार्टी के हाथों सौप दी । भारतीय जनता की लोकतंत्र ,लोकनायककी । भी ,आतंक  ,दमन , तानाशाही ,निरंकुश शासन पर बड़ी जीत थी। जय प्रकाश नारायण को  जीत का श्रेय देते हुए उनको देश के प्रधान मंत्री का पद स्वीकार करने अनुरोध किया गया  । लोगों  ने  श्री  जयप्रकाश  नारायण जी की  महानता को तब देखा जब उन्होंने यह कहते हुए प्रस्ताव ठुकरा दिया की मैं कभी पद की लालसा से काम नहीं किया।  मोरारजी देसाई के नेतृत्व मैं पहलीबार गैर कांग्रेसी सरकार अस्तित्व मैं आई। इतिहासकार लोकनायक श्री जय प्रकाश नारायण जी देश के जागरूक नागरिकों ,छात्र छात्रों ,युवक -युवतियों ,सामाजिक संगठनों से जुड़े। उन तमाम जनप्रतिनिधियों ,बुध्धि जीवियों द्धारा देश की दशा , दिशा  परिवर्तन  हेतु उठाये गए कदमों के साथ  काव्य- कृति ''क्रांतिदूत '' का मूल्यांकन करेंगे ।श्री जयप्रकाश नारायण जी अपने प्रयासों से तानाशाह को सबक सिखाने में  कहाँ तक कामयाब रहे ।  मूल्यांकन  करेंगे कवि रमाकांत बड़ारया काव्य- कृति क्रांति  के रचनाकार ''क्रांतिदूत ''को जनता के सामने को पेश करने मैं कहा तक सफल रहे  । मेरे मत से कवि रमाकांत बड़ारया  क्रांतिदूत  रचना  को मूर्त  रूप देने मैं पूर्णरूपेण कामयाब रहे। उनके इस साहसिक कदम के लिए वे बधाई के पात्र हैं ,उनकी जितनी भी प्रसंशा की जाये कम है। रचनासार एवं हकीकत का इससे सूंदर वर्णन और क्या हो सकता है। 

''जब जब युग बदलता है , होता  यही सब कुछ है। 

 उतरता कहीं देवदूत नहीं,उभरता है क्रांतिदूत यहीं। ''

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 काव्य कृति क्रांतिदूत 

(जयप्रकाश नारायण )------

के अंश आपके लिए 

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 मैं कैसे भुला दूँ उनको बोलो 

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जीवन भर के संघर्षों में

प्रेरणा के जो श्रोत्र रहे हैं 

मैँकैसे भुला दूँ उनको बोलो 

जीवन भर के --------------


तन के रिश्ते घावों पर 

की है जिनने मरहम पट्टी 

मैँ कैसे भुला दूँ उनको बोलो 

जीवन भर के --------------


सत्य का साथ निभाया जिनने 

अन्याय के विरुद्ध लड़ी लड़ाई 

मैँ कैसे भुला दूँ उनको बोलो 

जीवन भर के --------------


भेदभाव किया नहीं जिनने 

पास आया गले लगाया उसको 

मैँ कैसे भुला दूँ उनको बोलो 

जीवन भर के --------------


स्वार्थ से ऊपर उठकर जिनने 

अपना कर्तव्य निभाया 

मैँ कैसे भुला दूँ उनको बोलो 

जीवन भर के --------------

--------------कवि - रमाकांत बडारया


  


      


  

Wednesday, 11 October 2017

उनके  चेहरे पै  आ  गई  रौनक  हमको  देखकर 
हमको भी हमको भी आ गई हंसी उनको देखकर 

Friday, 2 October 2015

************नीली -नीली झील सी गहरी आँखें ******
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तेरी आँखें सुन्दर आँखें
नीली -नीली झील सी गहरी आँखें
दे रहीं मौन निमंत्रण
आकर इन दो आँखों की
मदिरा  को पी लो
जीना अगर तुम्हे ना आये
आकर जीना हमसे सीखो
तेरी आँखें --------------------

आँखों की भाषा को
आँखों ने ही समझा है
साथ हमारा और तुम्हारा
जनम- जनम  का है
आओ इन दो आँखों की गहराई को
हम -तुम मिलकर नापें
इन दो आँखों की गहराई में
हम-तुम आज उत्तर जाएँ
तेरी आँखें --------------------------

बाग़ मैं खिलती कलियों का
फूलों पर इठला -इठला कर मड़राना
कहता हमको -तुमको कैसा शर्माना
आओ ऐसी जगह करें मुकाम
प्यार मैं झूमें सुबहो शाम
दिन भी बीते रात भी बीते
कहीं बीत न जाये उम्र
इसका कुछ तो करो ख्याल
तेरी आँखें सुन्दर आँखें -------------------------


Monday, 21 September 2015

*************सिहर उठता हूँ सोच कर !**********
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उदास चेहरे पै आ गई रौनक हमारे उन्हें देखकर
होश गवा बैठे हम पल - भर उनको निहार कर
घर के रहे न घाट के हम हँस कर उनसे बात कर 
घर का रास्ता भूल गए हम नाजनीन की याद कर
इरादे समझ सके ना हम उनकी मासूमियत को देखकर
हम अपना सर्वस्त्र लुटा बैठें साथ एक पल गुजार कर
भूल हुई भारी ऐ -खुदा माफ़ कर मुझपे अहसान कर
महगा बड़ा पड़ा मुझे ये सफर सिहर उठता हूँ सोचकर
---------------------रमाकांत बड़ारया "बेताब" दुर्ग
(२१-९-२०१५बैठे ठाले )
*********रौनक गायब होनी ही थी***********
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कल तक  तो  साहब के चेहरे पर बेहद रौनक थी
कल तक तो  साहब के चेहरे पर लाली छाई थी

आज  साहब  के  चेहरे  पर  मायूसी  का  डेरा है
आज हुआ ऐसा क्या साहब के माथे पर चिंता थी

कल तक साहब के घर महफ़िल थी जमती जमकर
आज  साहब  के घऱ की  रौनक बिलकुल गायब थी

शह  और  मात  का  गंदा  खेल बहुत खेला साहब ने
इक दिन साहब  के घर की रौनक गायब होनी ही थी
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============रमाकांत बड़ारया  "बेताब" दुर्ग






Tuesday, 1 September 2015

********************यही है इतिहास**************
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दिन पर दिन
गुजरते चले गए
समय बीत गया 
समय जीत गया
हम हार गए
बहुत चले मगर
जहाँ के तहँ रहे
कहते हैं सयाने
कहें अगर बड़े तो मानें
हम कहाँ मानते हैं पर
हमे हमारा रास्ता ही
सही और
सफल होने वाला दिखता है
जब वास्तविकता
सामने आती है तो बंधू
धरातल पर नज़र आते हैं
कहीं प्यार तमाशा है
कहीं प्यार कहानी है
कहीं हंसती है
कहीं रोती जवानी है
फिर भी
रहस्य और रोमांस
इसके पीछे
भाग रहा है नादान
क्या है काम का
और क्या है बे-काम
समझ नहीं पा रहा नादान
समझ अगर जाये तो
है वह इंसान
अगर ना समझे तो
समझो है वह हैवान
समझ यही तो है
जानवर से इंसान की पहचान
तीन किस्तों में
अपनी जिंदगी
जी रहा है आदमी
बचपना -जवानी और बुढ़ापा
बचपने पर जवानी आती है
जवानी पर बुढ़ापा
जवानी वक़्त को
वश में करने की
कोशिश करती है
मगर वक़्त
जवानी को वाश में कर लेता है
आदमी मजबूर हो जाता है
फिर गुजरा हुआ
ज़माना याद आता है
मानव जीवन
चिंगारी की तरह होता है
जो पल भर के लिए चमकती है
फिर भुझ जाती है
मानव जीवन
एक सरिता की तरह है
जो टेढ़ी-मेढ़ी चलती है
कहीं श्रजन करती है
कहीं करती है विनाश
यही है इतिहाश
कहीं जन्म की खुशी है
कहीं मृत्यु से शोक
कहीं शादी की रश्में हैं
कहीं चिता की तैयारी
कहीं कोई
जीवन साथी की तलाश में
कहीं कोई
जीवन साथी से छुटकारा पाने
प्रयासो में रत
कहीं दो प्रेमी
एक होने प्रयत्नशील
कहीें दो भाई
जुदा होने की तैयारी में
कोई नव-निर्माण में व्यस्त
कोई कर रहा
वि -ध्वंशक की तैयारी
क्या हम आगे बढ़ रहे हैं
या जा रहे सदियों पीछे
कह नहीं सकते बंधू
यहां कौन क्या
क्या सपने ग़ढ रहा है?
------रमाकांत बड़ारया "बेताब " दुर्ग
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**********२२-११-१९७६*************
**************माखौल उड़ा रहे थे *****************
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हम तो शोषित और पीड़ितों की बात कर रहे थे
वो अपने स्वार्थ मैं लिप्त हो लोगों को डरा रहे थे
उनका इतिहास उठा के देख लो समझलो खूब
अपने स्वार्थ के लिये देश को लूट रहे-लूटा रहे थे
शांतीदूतों परबरसाने लाठियां दामन में जिनके दाग
चापलूस यहां हंसकर- उनके हौसले बढ़ा रहे थे
खुलकर बात कहने का जिनने समय दिया कभी नहीं
अपनी बात को ताल ठोक कर कहो जुमले चला रहे थे
हाथ में जब भी किसी के यहां सत्ता रुपी ताकत नही रही
"बेताब" साठ-गांठ कर लोग अपना माखौल उड़ा रहे थे
----------------------रमाकांत बड़ारया "बेताब " दुर्ग ----------------