Thursday, 20 August 2015



*******एक आग सुलगती है सीने में  *********
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रोज़ सबेरे आकर सूरज
अपनी किरणे बोता है
जग के तम को हर लेता है
एक आग सुलगती है सीने में
मन मैं छाया सदियों से अँधियारा
मेरे मन के तम को हर ले
वह सूरज कब आएगा

हर बरस घटायें आतीं हैं
 धरती की प्यास बुझातीं हैं
एक आग सुलगती है सीने में
 मेरा  मन सदियों से प्यासा
मेरे मन की प्यास बुझा  दे
वह बरखा कब आएगी

हर बरस बसंत बहारें आतीं हैं
गुलशन की मायूसी हर लेतीं हैं
मेरे मन में सदियों से मायूसी का डेरा
मेरे मन को खुशियों से पुलकित कर दे
वह बसंत बहारें कब आएँगी

        -----   रमाकांत बड़ारया "बेताब "दुर्ग -----
                  (रचना कल ४-८-१९७९)
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