--------------------------------श्री मुकुटधर पाण्डेय जी ---------------------------------
**जन्म --बालपुर (रायगढ -सारंगढ़ मार्ग )30.09.1895 *निर्वाण 06.11.1989** श्री मुकुटधर पाण्डेय जी का जन्म क्षतीसगढ़ की पावन माटी के एकछोटे से ग्राम बालपुर ,रायगढ़ जिला ,बिलासपुर में 30.09.1895 को धर्मऔर ममता की प्रति-मूर्ति माँ श्रीमती देवहुति देवी एवसंस्कृत के प्रकांडविद्वान् पिता पंडितश्री चिंतामणी पाण्डेय जी के पुत्र एव साहित्यानुरागी
**जन्म --बालपुर (रायगढ -सारंगढ़ मार्ग )30.09.1895 *निर्वाण 06.11.1989** श्री मुकुटधर पाण्डेय जी का जन्म क्षतीसगढ़ की पावन माटी के एकछोटे से ग्राम बालपुर ,रायगढ़ जिला ,बिलासपुर में 30.09.1895 को धर्मऔर ममता की प्रति-मूर्ति माँ श्रीमती देवहुति देवी एवसंस्कृत के प्रकांडविद्वान् पिता पंडितश्री चिंतामणी पाण्डेय जी के पुत्र एव साहित्यानुरागी
सालिग्राम जी पाण्डेय के सु-पोत्र के रूप में सु-संस्कृत ,धार्मिक और परम्परावादी परिवार में जन्म हुआ .रायगढ़ निवास रहा तब कौन जनताथा यहीबालक आगे चलकर प्रखर छायावाद शब्द का साहित्य में जनक, बनेगा ताजपहनेगा ! क्षतीस गढ़ का नाम रौशन करेगा ! .श्री मुकुटधर पाण्डेय जी अपने आठ भाईयों में सबसे छोटे थे .कुल 8भाई4बहने 1-पंडितलोचनप्रसाद 2,--पंडितपुरसोतदास ,3-पंडित पद्मलोचन,4पंडित चंद्रशेखर 5-पंडितविद्याधर 6 -पंडित बंशीधर,7-पंडितमुरलीधर ,8 पंडित मुकुटधर पाण्डेय .जी !पंडित लोचन प्रसाद पाण्डेय जी की गड़ना दिवेदी युगीन साहित्यकारों मेकी जाती थी .साहित्य -जगत में विशेष स्थान रखते थे घर के साहित्यकवातावरण ने पंडित श्री मुकुटधर पाण्डेय मे साहित्य के प्रति रुझान उत्पन्न किया .क्योंकि घर पाठशालाहोतीहै.पंडित मुकुटधर पाण्डेय जी की बहनें1-चंदंकुमारी,2-यज्ञ्कुमारी ,3सूर्यकुमारी4-आन्द्कुमारी थीं ! सबसे छोटे होने के कारण पंडित मुकुटधर पाण्डेय जी कोभाईबहनों काअसीम प्यारमिला बचपन1 907में ही पिताश्री का देहांत हो गया
आपकी आरंभिक शिक्षा गाँव मैं ही हुई .1915 में प्रयाग विश्वविध्यालय की प्रवेश परीक्षा उतीर्ण कर भर्ती हुए परन्तु आगे नहीं बढ़ पाए .1 पंडित मुकुटधर पाण्डेय जी ने 12 वर्ष की उम्र मैं लिखना आरंभ किया पर बचपनमेंपिता का निधन होने पर लेखन पर कोइ असर नहीं हुआ,निरंतरजारी रहा .तब कौनजनता था यहीबालक आगे चलकर मुखर छायाबाद का सरताज
बनेगा .
साहित्य जगत में अपने माता पिता परिवार ,क्षतीसगढ़कपावनधराको अलंकृतकरेगा.हिंदी,अरबी,बंगला,उड़िय,अंगेजी
साहित्य का अध्यन घर पर ही किया .महानदी के पावन तट पर सहज ग्राम्य जीवनका रस लेते हुए पंडित श्री मुकुटधर
पाण्डेय जी ने अपनी लेखनी को इन्हीं माहोल में ढाला संजोया."ग्राम्य -जीवन"कवितामैं .देखिये ग्राम्य जीवन का वर्णन कितना सुंदर मनोहारी द्र्यश प्रस्तुत करती हैकविता ! क्या ऐसा वर्णन आजकी कविता में कहीं देखने मिलता है !--------
साहित्य जगत में अपने माता पिता परिवार ,क्षतीसगढ़कपावनधराको अलंकृतकरेगा.हिंदी,अरबी,बंगला,उड़िय,अंगेजी
साहित्य का अध्यन घर पर ही किया .महानदी के पावन तट पर सहज ग्राम्य जीवनका रस लेते हुए पंडित श्री मुकुटधर
पाण्डेय जी ने अपनी लेखनी को इन्हीं माहोल में ढाला संजोया."ग्राम्य -जीवन"कवितामैं .देखिये ग्राम्य जीवन का वर्णन कितना सुंदर मनोहारी द्र्यश प्रस्तुत करती हैकविता ! क्या ऐसा वर्णन आजकी कविता में कहीं देखने मिलता है !--------
शान्ति पूर्ण लघु ग्राम बड़ा ही सुखमय होता है भाई
देखो नगरों से भी बढकर इसकी शोभा अधिकाई
देखो नगरों से भी बढकर इसकी शोभा अधिकाई
उपर द्वेष छलहीन यहाँ के रहने वाले चतुर किसान
दिवस बिताते हैं प्रफुल्लित चित करते अतिथियों का मान
दिवस बिताते हैं प्रफुल्लित चित करते अतिथियों का मान
*मुकुटधर पांडे जी प्रकृति के बड़े प्रेमी थे जो आपकी रचनाओं में साफ-साफ झलकताहै ,एक बानगी देखिये ---
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कितना सुंदर और मनोहर ,महानदी तेरा यह रूप .
कल-कल मय निर्मल जलधारा ,लहरों की छटा अनूप .
तुझे देखकर शैशव की है,स्मर्तियाँ उर में उठतीं जाग
लेता है किशोर काल का ,अँगडाई अल्हड अनुराग .
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कितना सुंदर और मनोहर ,महानदी तेरा यह रूप .
कल-कल मय निर्मल जलधारा ,लहरों की छटा अनूप .
तुझे देखकर शैशव की है,स्मर्तियाँ उर में उठतीं जाग
लेता है किशोर काल का ,अँगडाई अल्हड अनुराग .
कविता "मेरा प्रक्रति- प्रेम "में पंडित मुकुटधर पाण्डेय जी प्रक्रति का वर्णन यूँ करते हुए कहते हैं जरा गौर करें .----
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छोटे-छोटे झरने जो बहते सुखदायी
जिनकी अध्भुत शोभा सुखमय होती है भाई
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छोटे-छोटे झरने जो बहते सुखदायी
जिनकी अध्भुत शोभा सुखमय होती है भाई
पथरीले पर्वत बिशाल वृक्षों से सज्जित
बड़े-बड़े बागों को जो करते लज्जित
बड़े-बड़े बागों को जो करते लज्जित
इन्हें देख कर मेरा मन प्रसन्न होता है
सांसारिक दुःख ताप छिन में खोता है
सांसारिक दुःख ताप छिन में खोता है
पर्वत के नीचे अथवा सरिता के तट पर
होता हूँ मैं सुखी बड़ा स्वछन्द विचरकर
होता हूँ मैं सुखी बड़ा स्वछन्द विचरकर
*कविता "वर्षा बहार "में पंडित मुकुटधर पाण्डेय जी किसअनोखेअंदाज़ में वर्षा का वर्णन करते हुए मन मुग्ध कर देते हैं हैं करते गौर करें -------
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वर्षा बहार सबके मन को लुभा रही है ,
मैं नभ में छटा अनूठी ,घनघोर छा रही है .
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वर्षा बहार सबके मन को लुभा रही है ,
मैं नभ में छटा अनूठी ,घनघोर छा रही है .
बिजली चमक रही है,बदल गरज रहे हैं ,
पानी बरस रहा है ,झरने भी ये बह रहे हैं .
पानी बरस रहा है ,झरने भी ये बह रहे हैं .
चलती है हवा ठंडी ,हिलती हैं डालियाँ सब
बागों में गीत सुंदर,अब गातीं हैं मलिनें अब .
बागों में गीत सुंदर,अब गातीं हैं मलिनें अब .
तालों मैं जीव जलचर ,अति हैं प्रसन्न होते
फिरते काखों पपीहे ,हैं ग्रीष्म ताप खोते .
फिरते काखों पपीहे ,हैं ग्रीष्म ताप खोते .
करते हैं नित्य वन में ,देखो ये मोर सारे ,
मेघ लुभा रहे हैं गाकर , सुगीत प्यारे .
मेघ लुभा रहे हैं गाकर , सुगीत प्यारे .
खिलते गुलाब कैसा ,सौरव उड़ रहा है ,
बागों मे खूब सुख से ,आमोद छा रहा है .
बागों मे खूब सुख से ,आमोद छा रहा है .
चलते हैं हंस कहीं से ,बांधे कतार सुंदर ,
गाते हैं गीत कैसे ,लेते किसान मनहर .
गाते हैं गीत कैसे ,लेते किसान मनहर .
इस भाँती है अनोखी ,वर्षा बहार भू-पर ,
सारे जगत की शोभा ,निर्भर है इसके ऊपर .
सारे जगत की शोभा ,निर्भर है इसके ऊपर .
*विदेशी पक्षी कुररी समय मैं आकर अपना डेरा डाल लेता उसके विलम्ब से पहुचने पर वे उससे पूछते -हैं "कुररी "कविता मैं
कितनासुंदर वर्णन है देखें इसकी कुछ पंतीयाँ ----!
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बता मुझे ये विहग विदेशी अपने जी की बात
पिछड़ा था तू कहाँ ,आ रहा जो क्र इतनी रात .
कितनासुंदर वर्णन है देखें इसकी कुछ पंतीयाँ ----!
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बता मुझे ये विहग विदेशी अपने जी की बात
पिछड़ा था तू कहाँ ,आ रहा जो क्र इतनी रात .
निंद्रा मे जा पड़े सभी ,ग्राम मनुज स्वछंद
अन्य विहग भी निज नीडों में सोते हैं सानंद .
अन्य विहग भी निज नीडों में सोते हैं सानंद .
इस नीरव घटिका में उड़ता है तू चिंतित गात
पिछड़ा है तू कहाँ क्यों हुई तुमको इतनी रात .
पिछड़ा है तू कहाँ क्यों हुई तुमको इतनी रात .
श्री मुकुटधर पाण्डेय जी ,की नजरों मैं एक कवि कौन है इसका वर्णन यूँकरते हैं "कवि "कविता सरस्वती के अक्टूम्बर1919 के
अंक में प्रकाशितहुई थी देखें कुछ लाइनें ----
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नहीं -नहीं मेरे विचार में कवि तो है उसका ही नाम ,
यम-दम संयम के पालन युत होते हैं जिनके सब काम
अंक में प्रकाशितहुई थी देखें कुछ लाइनें ----
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नहीं -नहीं मेरे विचार में कवि तो है उसका ही नाम ,
यम-दम संयम के पालन युत होते हैं जिनके सब काम
रहती है कल्पना -कामिनी जिसके हिर्दय -कमल आसीन ,
संचालित करती सदेव जो भांति- भांति के भाव नवीन .
संचालित करती सदेव जो भांति- भांति के भाव नवीन .
श्री मुकुटधर पाण्डेय जी की नजरों में कविता क्या है अपनी रचना"कविता " में यूँ वर्णन करते हैं जो 1917 में चन्द्र- प्रभा में प्रकाशितहुई थी पन्तियाँ देखें -----
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कविता सु-ललित परिजात हास है,
कविता नश्वर जीवन का उल्लास है .
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कविता सु-ललित परिजात हास है,
कविता नश्वर जीवन का उल्लास है .
कविता रमणी के उर का प्रतिरूप है ;
कविता शैशव का सुविचार अनूप है .
कविता शैशव का सुविचार अनूप है .
कविता भावोन्मतों का सुप्रलाप है,
कविता कान्त जनों का म्रदु आलाप है .
कविता कान्त जनों का म्रदु आलाप है .
कविता गत गौरव का स्मरण विधान है ,
कविता चिर विरही का स-करुण गान है ,
कविता चिर विरही का स-करुण गान है ,
देश की विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में आपकी रचनाओं का सम्मान के साथ प्रकाशन हुआ है मात्र 14 वर्ष की उम्र में आपकी पहली कविता1909 आगरा से प्रकाशित होने वालीपत्रिका स्वदेश में प्रार्थना पंचक शीर्षकसे प्रकाशित हुई.1916में प्रथम कविता संग्रह "पूजा के फूल "प्रकाशित हुआ .पंडित मुकुटधरपाण्डेय जी की प्रकाशि , कृतियाँ ,पुस्तकें निम्म लिखित हैं .जो पठनीय हैं। जानें असली कविता क्या है ?,छायावाद क्या है आनंद क्या है?
1पूजा के फूल -1916
2-शैलबाला -1916 -
3-कुसुम 1916
4-लक्ष्मा -अनुदित उपन्यास -1917
5-परिश्रम -निबंध -1917
6-साईं बाल -1917
7--हिर्दय -दान 1918
8मामा -------1918
7समाज कंटक 1918
8स्मृति-पुंज 1983
9-छायाबाद और निबंध -1983
10छायाबाद और श्रेष्ठ निबंध 1984
11-विश्व-बोध --1984
12"मेघदूत "-का क्षतीसगढ़ी अनुवाद
2-शैलबाला -1916 -
3-कुसुम 1916
4-लक्ष्मा -अनुदित उपन्यास -1917
5-परिश्रम -निबंध -1917
6-साईं बाल -1917
7--हिर्दय -दान 1918
8मामा -------1918
7समाज कंटक 1918
8स्मृति-पुंज 1983
9-छायाबाद और निबंध -1983
10छायाबाद और श्रेष्ठ निबंध 1984
11-विश्व-बोध --1984
12"मेघदूत "-का क्षतीसगढ़ी अनुवाद
श्री मुकुटधर पाण्डेय जी की गध और पद्ध पर सामान पकड थी आपने मेघदूत का क्षतिसगढी भाषा मैं अनुवाद कर क्षतीस गढ़ी भाषा का मान-सम्मान बढाया को ख्याति प्रदान की बुलंदियों पर पहुँचाया आपकी कुछ प्रतिनिधि कविताएँ हैं -
1- किसान 2---ग्राम्य - जीवन 3- ग्राम- साफल्
4 महानदी 5-कुररी के प्रति --6-कृतज्ञन्य हिर्दय
7-खोंमचा वाला 8-जुगनू -9-गाँधी के प्रति 10 -तुलसीदास
11-शिशिर 12-विश्व -बोध 13-शारदा सम्मेलन 14-स्वागत
15 वर्षा बहार 16 बाल -परिचायक 17 मेरा प्रकृति -प्रेम
4 महानदी 5-कुररी के प्रति --6-कृतज्ञन्य हिर्दय
7-खोंमचा वाला 8-जुगनू -9-गाँधी के प्रति 10 -तुलसीदास
11-शिशिर 12-विश्व -बोध 13-शारदा सम्मेलन 14-स्वागत
15 वर्षा बहार 16 बाल -परिचायक 17 मेरा प्रकृति -प्रेम
श्री मुकुटधर पाण्डेय जी की रचनाओं में छाया,और रहस्यवाद की अमिट छाप देखि जा सकती है आपका लेखन एतिहासिक मह्त्व का है .श्री जय शंकर प्रसाद जी के शब्दों में" छायावाद " शब्द का सबसे पहलेप्रयोग श्री मुकुटधर पाण्डेय जी ने ही किया था .छायावाद को परिभाषितऔर नामकरण करने का श्रेयपंडित श्री मुकुटधर पाण्डेय जी को ही जाता है .1918 में लोकप्रिय हो चुकी इस शैली केसम्बन्ध में 1920 में "जबलपुर से प्रकाशित होने वाली पत्रिका शारदा मैं आपकी लेख माला का प्रकाश प्राम्भ हुआ .हिंदी में छाया बाद "शीषक से 4 आर्टिकलश प्रकाशित हुए तो इस पर राष्ट्र व्यापी विचार विमर्श हुआ .प्रारभ में छायावाद ने एतिहशिक चुनोतियों ,का ,मिस-अंडर स्टेंडिंग का सामना किया ,कन्ट्रो -वर्षियों का सामना किया आलोचकश्री शांतिप्रिय दिवेदी ने सुकवि किंकरके नाम से छायावाद की कटु आलोचना की,व् श्री सुशील कुमार के आलोच्मात्म्क लेख के विरोध में आपने छायावादके समर्थन में पुरजोर वकालतकी.प्रति-उत्तर में मुकुटधर पाण्डेय जी ने एक लेखलिखा जिसका शीर्षक था"छायावाद क्या है?"जिसमे उन्होंने लिखा -!"लोग जिन्हें अंग्रेजी एवम बंगला भाषा का थोडा बहुत ज्ञान है वे आसानी
से समझसकते हैं की शब्द "छायावाद "का प्रयोग mysticism- (रहस्यवाद )केलिए होता है।आपके ही प्रयासों से छायावाद को मान्यता मिली सम्मानजनकस्थान प्राप्त हुआ .
1920में सरस्वतीमें प्रकाशित कविता "कुररी के प्रति "श्री पदुमलाल पुन्नालाल जी बक्क्षी के अनुसार यह कविता "छायावाद "की प्रथम कविता है !कुररी के प्रति कविता एक ऐसी कविता है जिसमे छायावादके सभी तत्व समाहित हैं "कुररी के प्रति"कविताके सम्बन्ध मैं डा-शिवमंगल सुमन ने कहा था-"कुररी के प्रति कवितामैं तो भारतवर्ष की साडी सम्वेदना की परंपरा निहित है" हिंदी कविता में आपनेएक नये युग कीशुरुआत की ! देखें "कुररी के प्रति" कविता की कुछ पन्तियाँ ___
बता मुझे ऐ विहग विदेशी ,अपने जी की बात .
पिछड़ा था तू कहाँ ,आ रहा जो कर इतनी रात .
पिछड़ा था तू कहाँ ,आ रहा जो कर इतनी रात .
विहग विदेशी मिला आज तू बहुत दिनों के बाद
तुझे देखकर फिर अतीत की आई मुझको याद .
तुझे देखकर फिर अतीत की आई मुझको याद .
ऐसे ही हम साहित्य बिरादरी के लोग पुराणी पीढ़ी के साहित्यकारों के अतीत मैंझांक रहे हैं .उनका पूण्य स्मरण कर रहे हैं, ताकि साहित्य श्रजन ,पठान पठान मेंरूचि जगे .पथ प्रदर्शन हो .वर्ष 1928 में कलकत्ता की कांग्रेस अधिवेशन मे अपनी "किसान "कविता का पथकिया श्री मुकुटधर पाण्डेय जी ने कुछ वर्षों तक रायगढ स्टेट में दंडाधिकारी रहे उन्होंने कभी भी राजे महाराजों की वंदना मे लेखन नहीं किया.वे बड़े स्वाभीमानी थेचक्रधर ललितकला केंद्र रायगढ के वर्षों तक अध्यक्ष पद पर रहे .गरिमा प्रदान की .डा-विमल कुमार पाठक ने पंडित मुकुटधर पाण्डेय जी पर क्षतीसगढ़ी एक गीतलिखा जो वे अक्सर सुनाया करते,जो उनके प्रति सम्मान को दर्शाता है .देखें कुछ पन्तियाँ .-
मुकुटधर तुहर नाम हे भारी ,
तुम साहित्य -देवता अव जी हम अन तुहर पुजारी .
मुकुटधर तुहर नाम हे भारी
महानदी ले बोलेव तुमन
कुररी के मुंह खोलव तुमन
टेसू तिर तुम रोयेन धोयेन
अऊ किसान संग जागेन सोयेन .
सबले बोलेव अऊ गोठियायेव
जड़ चेतन भेद भुहुलायेन
छायावादी कविता लायेव
पद्मश्री पदवी ल पायेव .
ऋषि मुनि कस देखेन तुमला
नई मानेन संसारी .
मुकुटधर तुहर नाम हे भारी .
***सम्मान और अलंकरण **
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1--आपको वर्ष 1976 मैं पद्मश्री अलंकरण से सम्मानित किया गयाक्षतीसगढ़ के साहित्यकारों में इस सम्मान को प्राप्त करने वाले प्रथमसाहित्यकार होने का गौरव आपको ही प्राप्त है
तुम साहित्य -देवता अव जी हम अन तुहर पुजारी .
मुकुटधर तुहर नाम हे भारी
महानदी ले बोलेव तुमन
कुररी के मुंह खोलव तुमन
टेसू तिर तुम रोयेन धोयेन
अऊ किसान संग जागेन सोयेन .
सबले बोलेव अऊ गोठियायेव
जड़ चेतन भेद भुहुलायेन
छायावादी कविता लायेव
पद्मश्री पदवी ल पायेव .
ऋषि मुनि कस देखेन तुमला
नई मानेन संसारी .
मुकुटधर तुहर नाम हे भारी .
***सम्मान और अलंकरण **
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1--आपको वर्ष 1976 मैं पद्मश्री अलंकरण से सम्मानित किया गयाक्षतीसगढ़ के साहित्यकारों में इस सम्मान को प्राप्त करने वाले प्रथमसाहित्यकार होने का गौरव आपको ही प्राप्त है
2-- साहित्य के योगदान के लिए रविशंकर विश्वविध्यालय एवंगुरू -घासीदास विश्वविध्यालय के द्वारा डी .लिट् की मानद उपाधि प्रदान की गयी .
06 नवम्वर 1989 को क्षतीसगढ़ के अनमोल रत्न साहित्य -मनीषीप्रखर -साहित्यकार युग -पुरुष ने लम्बी बीमारी के बाद रायपुर मैं अंतिमसाँस ली , और दुनिया को अलविदा कहा .क्षतीसगढ़ ,साहित्य जगत आपकाहमेशा ऋणी रहेगा अन-मोल साहित्य के माध्यम से आप हमेशा याद किये जायंगेआपके पास यदिपंडित मुकुटधर पाण्डेय जी से जुडी रचना-धर्मिता से सरोकार रखने वाली कोई महत्व्पूर्ण जानकारी हो एवं प्रेरक संस्मरणों की जानकारी हो तोअवस्यही पाठकों तक संगवारी के माध्यम से पहुचाएं . जैसा मैंने जाना .
******************************रमाकांत बड़ारया . शंकर नगर -दुर्ग 9926529074
******************************रमाकांत बड़ारया . शंकर नगर -दुर्ग 9926529074
डाँ. कांतिकुमार जैन ने एक जगह लिखा है " छायावादी काव्य के ज्येष्ठ पुरूष मुकुटधर पांडेय के व्यक्तित्व और काव्य को पूरी तरह जानने के लिए डाँ. बलदेव को जानना अनिवार्य है, उनका पांडेय जी से वैसा ही संबंध है जैसा बासवेल का प्रसिद्ध अंग्रेजी साहित्यकार जाँनसन से था। .......छायावाद के प्रारंभिक दौर को बिना मुकुटधर पांडेय को समझे , नहीं समझा जा सकता और मुकुटधर जी पांडेय के कृतित्व और प्रदेय को डाँ. बलदेव व्दारा उपलब्ध सुरक्षित और विवेचित साहित्य के बिना। उन्होंने मुकुटधर पांडेय के साहित्य का पुनराविष्कार किया और गद्य पद्य अनुवाद आदि का प्रकाशन किया। डाँ. बलदेव का यह ऋण छायावाद के प्रेमी पाठक और विद्वान कभी नहीं चुका पायेंगे" ।
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