Monday, 31 August 2015

Sunday, 30 August 2015

HARSH: HARSH: HARSH: HARSH: वैतागवाड़ी: कुछ कांच हैं, कोई...

कवि और उसकी कविता

कवि और उसकी कविता
बहती है जैसे
वीरान  घाटियों मैं
अपार जल राशि लिए
 एक  चंचल सरिता

नदी  के दो किनारे हैं
पानी को अपने मैं समेटे
उसके मजबूत  सहारे हैं

 

  


... :

Thursday, 27 August 2015



***************खून का असर*********************************
------------------------------------------------------------------------------
सरयूप्रसाद कोर्ट में स्टेनो -ग्राफर के पद पर कार्यरत थे
दिखने में सुंदर ऊचे पूरे.
उन्होंने अपने परिवार से बगावत करके अपनी एक रूपवती सहकर्मी से प्रेम-विवाह किया
इसके लिए उन्होंनेअपने बुजुर्ग माता -पिता का कोइ ख्याल नहीं किया उन्हें असहाय छोडकर अपनी रूपवती अर्धांग्नी को लेकर सरकारी बंगले मै जुगाड़ कर रहने चले गये .
वे अपने पिता की एक मात्र संतान थे ऐसे में उनका फर्ज बनता था ,अपने माता -पिता की इच्छा कासम्मान करते उन्हें सहारा देते .वे अपने जन्म दाताओं के दर्द को न समझ सके.
उन्हें अपनी प्रेयसी के आंचल में अपना भविष्य नजर आया
सरजूप्रसाद तो प्यार में अंधेथे .वे यह भी भूल गये उनके माता- पिता का क्या होगा
जीवन के अंतिम दिनों में उन्हें कौन सहारा देगा
बेटे के गम और समाज मे किसी के सामने सर उठा कर न रह पाने के गम में उनको गहरा आघात लगा
इसी बीच पुत्र -रत्न की प्राप्ति सरजूप्रसाद .को हुई
माता पिता बड़े स्वा-भिमानी थे माता -पिता ने अपने बेटे-बहु के सामने कभी हाथ नही फैलाये .बेटा भी इतना एहसान फरामोस निकला उसने भी उनकी कभी खबर नहीं ली
.बुरा समय गुजारते हुए अंतिम सांसे ली .उसे उनका अंतिम संस्का रभी .नसीब नहीं हुआ .
समय का पहिया ऐसा चलता है उसकी गति को कोई नहीं समझ सकता .समय की मार से अब तक कोइ नहीं बच सका
सरजूप्रसाद का स्वास्थ अचानक खराब हो गया
जब उसका बेटा 10 वर्ष का था तभी सरजूप्रसाद का देहांत हो गया ।
अपनी प्रेयसी को जीवन में संघर्ष करने अपने नाबालिग का भार उस पर छोड़ गया ,
शायद भगवान् ने मोहनी को अपने बेटे को असहाय मां -बाप से अलग करवाने की सजा दी हो .
उनकी हाय लगी हो .ईश्वर के यहाँ देर है अंधेर नहीं है .
समय गुजरता गया ,सरजूप्रसाद का बेटा सुन्दरलाल पढ -लिखकर इंजीनियर बन गया
.मोहनी को अपने बेटे सुन्दरलाल की पढाई लिखाई में अपनी जमा पूंजी खर्च कर दी .इतना ही नहीं अपनी छत्र-छाया मकान भी गिरवी रख दिया
हर कोई चाहता है उसकी संतान काबिल बने .अपनी जिम्मेवारी मोहनी ने बखूबी निभाई.
जल्दी ही बेटे सुन्दरलाल की एक अच्छी कम्पनीमें नौकरी लग गयी .
एक दिन बेटा माँ से बोला माँ तुमने मुझे पढ़ाने में कितने कष्ट झेले है अब सुख के दिन आ गये अब जीवन मे तुझे कोइ दुःख नहीं उठाना पड़ेगा.
तेरा बेटा तेरे कदमों में जीवन की साडी खुशियाँ ला देगा
तुझे कोई तकलीफ नहींहोने दूंगा
मोहनी अपने भाग्य को सराहती .अपने बेटे की तारीफ हर किसी सेकरती
इसी बीच सुन्दरलाल को अपनी कम्पनी की एक सहकर्मी से प्यार हो गया ,अपनी माँ को एक दिन अवसर पाकर बताया माँ तुझे खाना पकाने में बड़ी तकलीफ होती है ,
जो मुझसे देखा नहीं जाता .सोचता हूँ अब शादी कर लूं
मनपसंद लडकी के सम्बन्ध में माँ को बताया तो उसे अपनाअतीत याद आ गया .
वह सोच मे पड़ गयी .
माँ को कुछ भी बोलता न देख सुन्दरलाल बोला
क्या बात है माँ ,क्या बात है ?
किस सोच में हो ?
नहीं कोइ बात नहीं है अपनी होंने र्वाली जीवन संगनी से कब मिलवा रहे हो बेटे .
सुन्दरलाल बोला माँ आपकी हां की जरूरत थी वह माँ के गले से लिपट गया गया .
मोहनी की आँखें आंसुओं से डबडबा गईऔर चाहकर भी विरोध न क़र सकी .
माँ इतवार को में लेकर आता हूँ .
सुन्दरलाल ने अपनी प्रेमिका को अपनी माँ से मिलवाया साथ मेंउसके माता -पिता भी थे
खुशी-ख़ुशी उनका रिश्ता मंजूर कर लिया कुछ समय बाद उनकी शादी संपन्न करवा दी .
समय बीतता गया .मोहनी सुंदर और सुशील बहु पाकर बहुत खुश थी अपने बेटे -बहू के साथ खुश थी
सबसे उनकी तारीफ करते थकती नहीं थी .
भविष्य मैं आने वाले तूफ़ान से अनजान,बे[खबर
समय अपना रंग कब बदलता है पता ही नहीं चलता !
एकदिन खाना खाते -खाते सुन्दरलाल अपनी माँ से कहता है
,माँ एक बड़ी खुश-खबरी है .
मेरी प्यारी माँ मेरी कम्पनी मुझे अमेरिका भेज रही है .विभाग प्रमुख बनाकर
एक दो दिन में बीजा मिल जायेगा .
पहले मई अकेला जाऊंगा बाद में तेरी बहु का ट्रांसफर वहीं करवाकर परिवार सहित वही रहेंगे .मोहनी बोली ये तो बड़ी ख़ुशी की बात है
वह सोचकर प्रसन्न थी की उसे भी अमेरिका जाने ,विदेश घूमने का मौका मिलेग .
भगवान परिवार पर मेहरबान लगते हैं .जो तुझे इतना बड़ा अवसर मिल.
कुछ दिनों बाद सुंदरलाल अमेरिका चला गया .
दिन -रात अपनी गति से से चलते रहे .
एक दिन सुंदर लाल का फोन आया वह खुश होकर बोला माँ आपकी
बहु के ट्रांसफर का आवेदन मंजूर कर लिया है
माँ बोली ये तो बड़ी ख़ुशी कीबात है .परिवार साथ-साथ रहेगा .
यह बहु बेचारी पति के बिना उदास रहती है
.माँ मैंने उसे भी यह खुश-खबरी दे दी है .और तेयारी करने का बोल दिया हूँ
शीघ्र आकर ले जाउंगा .मोहनी बोली ठीक है बेटा जल्दी आना
हम लोग तेरा बे-सबरीसे इंतज़ार करेंगे तू उडकर जल्दी आ जा .
मोहनी भी अमेरिका जाने की तयारीकरने लगी .
पर नियति को कुछ ही मब्जूर था जिससे वह अनजान थी .
कुछ दिनोंके बाद सुन्दरलाल अमेरिका से घर आया खाना खाते-खाते वह माँ से बोला
माँ हमे कल ही बापस जाना है।
तू फ़िक्र मत करना हम वहाँ अच्छे से सेटल होकर ,उपुयुक्त भवन खोजकर तुझे भी वहाँ बुलवा लूगा .
अभी एक बेडरूम और किचन वाला मिला है सबके लायक खोज रहा हूँ
मोहनी बोली पर बेटे तूने यह पहले नहीं बताया .
सुंदरलालबोला माँ मैंने बतायातो था ,
शायद ख़ुशी के मारे तू ठीक से सुन नहीं पाई होगी .\
माँ तू फ़िक्र क्यों करती हैतुझे भी शीघ्र उड़कर ले जाऊंगा.
मेरीअच्छी माँ ,प्यारी माँ .में समय पर पैसे भेजता रहूँगा
घर खर्च और साहूकार का कर्ज पटाने ताकि तू जल्दी कर्ज मुक्त हो सके
छत बनी रहे .
सुंदर लाल की पत्नी माँबेटे का प्यार देखकर मंद-मंद मुस्करा रही थी .
वह खुश थी।उसे अब स्वतंत्रतापूर्वक जीने का अवसर मिलेगा .
बेटे की बात सुनकर मोहनी का मोह भंग हो गया .
उसके सरे ख्वाब चकनाचूर हो गये .
काटो तो खून नहीं .
वह सोचने लगी मेरे बेटे क्या ?इसी दिन के लिए मैंने तुझे इस काबिल बनाया था
एक दिन तू मुझे अकेला छोडकर कहीं और मौज मस्ती से दिन गुजार .
मेरे बेटे पैसा ही सब कुछ नहीं होता .
माँ की आँखों मैंआंसू देखकर सुन्दरलाल बोला माँ क्या ? तुझे अपने बेटे पर भरोसा नहीं है।
व्यवस्था होने पर तुझे भी बुलवा लूँगा .
मोहनी मन मार क्र बोली ठीक है बेटा ,तेरी जैंसी मर्जी .तू जैसा उचित समझे
उसे अपना गुज़रा हुआ अतीत चल-चित्र की तरह सामने आने लगा . उसे उसका भविष्य अंधकारमय नजर आने लगा .
इतिहाश दुहराएजाने की कगार पर था इसका मोहनी को य -हसास होने लगा था .
बेटा सुन्दरलाल अपनी पत्नी को लेकर अमेरिका चला गया ,माँ को भगवन भरोसे छोडकर .नियति भी अनोखे खेल खेलती है
सुन्दरलाल नियमित पैसे भेजता रहा घर का खर्च ठीक से चलता रहा साहूकार का कर्ज भी पटता रहा .
सुन्दरलाल ने माँ को पुत्र रत्नप्राप्ति की सूचना दी सुनकर बोली बेटा मेरा मन पोते को देखने नाचल रहा है ,जल्दी आ मुझे ले जा .
सुन्दरलाल बोला हाँ -हाँ माँ तुझे लेने जल्दी आता हूँ आने की खबर करता हूँ .
मोहनी अपने बेटे के आने का इंतज़ार करती रही ,
पर बेटे का आना तो दूर ,उसने पैसे भी भेजना बंद कर दिया
न ही कभी फोन ही किया .फोन करने पर हमेशा नो रिप्लाई का सन्देश सुनाई देता .
यहाँ घर का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा था .
उपर से साहूकार घर से बेदखल करनेकी रोज धमकियाँ दे रहा था
उसकी सुनने वाला कोइ नहीं था .
वही हुआ जिसका उसे डर था
साहूकार ने गुंडे भेजकर उसे घर से बहर निकालकर कब्जा क्र लिया
वह कुछ नहींकर सकी .
मजबूरी में उसे ब्रर्ध -आश्रम मैं शरण लेनी पडी
यहाँ उसकी आत्मा चिल्ला-चिल्ला कर
कहती अपने किये की सजा सजा यहीं पर मिलती है.
पाप का घड़ा फूटने में देर नहीं लगती
"खून का असर " कहीं नहीं जाता .
वह अपना रंग दिखाता ही है"
सोचो जो तुमनेअपने सास -ससुर के साथ क्या ?अच्छा किया था .
जो सूरज लाल ने अपने माँ बाप केसाथ किया
अब वही सुन्दरलाल तुम्हारे साथ कर रहा है ,क्योंकि वजह तुम्हीं थीं .
इश्वर के यहाँ देर है पर अंधेर नहीं है
वह सोचती काश मैं पाप का भागिदार न बनी होतीतो ये दिन देखने नमिला होता
बेटे पोते की याद लिये ,मन पर भारी बोझ लिए
मोहनीइस दुनिया को---------अलबिदा कह गयी !

Wednesday, 26 August 2015

********फर्ज़ एक साहित्यकार का********
============================
में अपनी आवाज़ को 
पहुचाना चाहता हूँ 
तुम्हारे कानों तक 
कारण बहुत ही साफ है
तुम्हारे थके हुए पावँ
गतिहीन ना होने पायें
और तुम्हारा मस्तिस्क
निष्क्रिय ना होने पाए
तुम्हारे रुके हुए पाँव
पुनह ; गतीमान हो जाएँ
निष्क्रिय मस्तिस्क तुम्हारा
पुनह; किर्याशील हो जाये .
तुम्हारे अंध -विस्वास
और तुम्हारी मान्यताएं
जिनका आधार खोखला है ,
तुम उनको त्यागो .
अन्धकार से उजाले में आओ
तुम जिहे पूजते हो
पूजने के वे काबिल नहीं हैं .
तुम्हे जिन्हें पूजना चाहिए
वे तुम्हे हासिल नहीं हैं
उन तक पहुचने का रास्ता बताउं.
मैं एक साहित्यकार हूँ
मेरा यह फर्ज़ है तुम्हे
सही और आसान रास्ता बताउं
सही और गलत मे
छोटे से छोटा अंतर बताऊँ .
यदि गलत रस्ते पर
चल पड़े हो तो सही राह दिखाऊं
अपने साहित्यकार होने का धर्म निभाऊं
कितनी हास्यास्पद स्थिति होगी
दिशा प्रदान करने क़ी बजाय
मैं भ़ी भ़ी वही करने लगूं
जो बुध्धीहीन और
पथ-भ्रष्टकरने मैं लगे हुए हैं
बे शर्मी से कह रहे हैं
हमे क्या लेना -देना है
सब चलता है
वे गलत फहमी का शिकार हैं
ज्ञान क़ी महत्ता तभी है
जब उसे बांटा जाये
समय-समय पर ज्ञान
ज्ञानियों से ग्रहण भ़ी किया जाए
ज्ञान प्राप्त करने मे शर्म कैंसी
रमाकांत सीखने क़ी कोई
ना सीमा होती है ना ही उम्र .
आज जब कोई साहित्यकार
किसी नवोदित रचनाकार को
उसकी कमियों क़ी ओर
निस्वार्थ इंगित करता है तो
उसे उसके जमीर पर चोट
होती नजर आती है
उसे गुमराह करने वालों क़ी फौज
उसके साथसीना तानकर
खडी नजर आती है
मत भूलो गुरू के वगैर
ज्ञान अधूरा है .
जब जागो तभी सबेरा है
वरना अधेरा ही अधेरा है ..
****************खून का असर*********************************
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सरयूप्रसाद कोर्ट में स्टेनो -ग्राफर के पद पर कार्यरत थे दिखने
में सुंदर ऊचे पूरे.उन्होंने अपने परिवार से बगावत करके अपनी
एक रूपवती सहकर्मी से प्रेम-विवाह कियाइसके लिए उन्होंने
अपने बुजुर्ग माता -पिता का कोइ ख्याल नहीं किया उन्हें असहाय
छोडकर अपनी रूपवती अर्धांग्नी को लेकर सरकारी बंगले मै
जुगाड़ कर रहने चले गये . वे अपने पिता की एक मात्र संतान थे
.ऐसे में उनका फर्ज बनता था ,अपने माता -पिता की इच्छा का
सम्मान करते उन्हें सहारा देते .वे अपने जन्म दाताओं के दर्द को
न समझ सके.उन्हें अपनी प्रेयसी के आंचल में अपना भविष्य
नजर आया सरजूप्रसाद तो प्यार में अंधेथे .वे यह भी भूल गये
उनके माता- पिता का क्या होगा जीवन के अंतिम दिनों में उन्हें
कौन सहारा देगा बेटे के गम और समाज मे किसी के सामने
सर उठा कर न रह पाने के गम में उनको गहरा आघात लगा इसी
बीच पुत्र -रत्न की प्राप्ति सरजूप्रसाद .को हुई माता पिता बड़े स्वा-
भिमानी थे माता -पिता ने अपने बेटे-बहु के सामने कभी हाथ नही
फैलाये .बेटा भी इतना एहसान फरामोस निकला उसने भी उनकी
कभी खबर नहीं ली .बुरा समय गुजारते हुए अंतिम सांसे ली .उसे
उनका अंतिम संस्का रभी .नसीब नहीं हुआ .
समय का पहिया ऐसा चलता है उसकी गति को कोई नहीं समझ
सकता .समय की मार से अब तक कोइ नहीं बच सका सरजूप्रसाद
का स्वास्थ अचानक खराब हो गया जब उसका बेटा 10 वर्ष का था
तभी सरजूप्रसाद का देहांत हो गया।अपनी प्रेयसी को जीवन में संघर्ष
करने अपने नाबालिग का भार उस पर छोड़ गया ,शायद भगवान्
ने मोहनी को अपने बेटे को असहाय मां -बाप से अलग करवाने की
सजा दी हो .उनकी हाय लगी हो .ईश्वर के यहाँ देर है अंधेर नहीं है .
समय गुजरता गया ,सरजूप्रसाद का बेटा सुन्दरलाल पढ -लिख
कर इंजीनियर बन गया.मोहनी को अपने बेटे सुन्दरलाल की पढाई
लिखाई में अपनी जमा पूंजी खर्च कर दी .इतना ही नहीं अपनी छत्र
-छाया मकान भी गिरवी रख दिया हर कोई चाहता है उसकी संतान
काबिल बने .अपनी जिम्मेवारी मोहनी ने बखूबी निभाई जल्दी ही बेटे
सुन्दरलाल की एक अच्छी कम्पनीमें नौकरी लग गयी .एक दिन बेटा
माँ से बोला माँ तुमने मुझे पढ़ाने में कितने कष्ट झेले है अब सुख के
दिन आ गये अब जीवन मे तुझे कोइ दुःख नहीं उठाना पड़ेगा.तेरा बेटा
तेरे कदमों में जीवन की साडी खुशियाँ ला देगा तुझे कोई तकलीफ नहीं
होने दूंगा मोहनी अपने भाग्य को सराहती .अपने बेटे की तारीफ हर
किसी से करती
इसी बीच सुन्दरलाल को अपनी कम्पनी की एक सहकर्मी से प्यार
हो गया ,अपनी माँ को एक दिन अवसर पाकर बताया माँ तुझे खाना
पकाने में बड़ी तकलीफ होती है ,जो मुझसे देखा नहीं जाता .सोचता हूँ
अब शादी कर लूं मनपसंद लडकी के सम्बन्ध में माँ को बताया तो उसे ,
अपना अतीत याद आ गया .वह सोच मे पड़ गयी .माँ को कुछ भी
बोलता न देख सुन्दरलाल बोला क्या बात है माँ ,क्या बात है ? किस
सोच में हो ?नहीं कोइ बात नहीं है अपनी होंने र्वाली जीवन संगनी से
कबमिलवा रहे हो बेटे .सुन्दरलाल बोला माँ आपकी हां की जरूरत थी वह
माँ के गले से लिपट गया गया .मोहनी की आँखें आंसुओं से डबडबा गई
औरचाहकर भी विरोध न क़र सकी .माँ इतवार को में लेकर आता हूँ .
सुन्दरलाल ने अपनी प्रेमिका को अपनी माँ से मिलवाया साथ में
उसके माता -पिता भी थे खुशी-ख़ुशी उनका रिश्ता मंजूर कर लिया और
कुछ समय बाद उनकी शादी संपन्न करवा दी .समय बीतता गया .मोहनी
सुंदर और सुशील बहु पाकर बहुत खुश थी अपने बेटे -बहू के साथ खुश थी
सबसे उनकी तारीफ करते थकती नहीं थी .भविष्य मैं आने वाले तूफ़ान से
अनजान,बे[खबर समय अपना रंग कब बदलता है पता ही नहीं चलता !एक
दिन खाना खाते -खाते सुन्दरलाल अपनी माँ से कहता है ,माँ एक बड़ी खुश
-खबरी है .मेरी प्यारी माँ मेरी कम्पनी मुझे अमेरिका भेज रही है .विभाग
प्रमुख बनाकर एक दो दिन में बीजा मिल जायेगा .पहले मई अकेला जाऊंगा
बाद में तेरी बहु का ट्रांसफर वहीं करवाकर परिवार सहित वही रहेंगे .मोहनी
बोली ये तो बड़ी ख़ुशी की बात है वह सोचकर प्रसन्न थी की उसे भीअमेरिका
जाने ,विदेश घूमने का मौका मिलेग .भगवान परिवार पर मेहरबान लगते हैं .
जो तुझे इतना बड़ा अवसर मिल.कुछ दिनों बाद सुंदरलाल अमेरिका चला
गया .दिन -रात अपनी गति से से चलते रहे .
एक दिन सुंदर लाल का फोन आया वह खुश होकर बोला माँ आपकी
बहुके ट्रांसफर का आवेदन मंजूर कर लिया है माँ बोली ये तो बड़ी ख़ुशी की
बात है .परिवार साथ-साथ रहेगा .यह बहु बेचारी पति के बिना उदास रहती है
.माँ मैंनेउसे भी यह खुश-खबरी दे दी है .और तेयारी करने का बोल दिया हूँ शीघ्र
आकर ले जाउंगा .मोहनी बोली ठीक है बेटा जल्दी आना हम लोग तेरा बे-सबरी
से इंतज़ार करेंगे तू उडकर जल्दी आ जा .मोहनी भी अमेरिका जाने की तयारी
करने लगी .पर नियति को कुछ ही मब्जूर था जिससे वह अनजान थी .कुछ दिनों
के बाद सुन्दरलाल अमेरिका से घर आया खाना खाते-खाते वह माँ से बोला माँ
हमे कल हीबापस जानाहै। तू फ़िक्र मत करना हम वहाँ अच्छे से सेटल होकर ,
उपुयुक्त भवन खोजकर तुझे भी वहाँ बुलवा लूगा .अभी एक बेडरूम और किचन
वाला मिला हैसबके लायक खोज रहा हूँ मोहनी बोली पर बेटे तूने यह पहले नहीं
बताया .सुंदरलालबोला माँ मैंने बतायातो था ,शायद ख़ुशी के मारे तू ठीक से सुन
नहीं पाई होगी .माँ तू फ़िक्र क्यों करती हैतुझे भी शीघ्र उड़कर ले जाऊंगा. मेरी
अच्छी माँ ,प्यारी माँ .में समय पर पैसेभेजता रहूँगा घर खर्च और साहूकार का
कर्ज पटाने ताकि तू जल्दी कर्ज मुक्त हो सके छत बनी रहे .सुंदर लाल की पत्नी माँ
बेटे का प्यार देखकर मंद-मंद मुस्करा रही थी .वह खुश थी।उसे अब स्वतंत्रता
पूर्वक जीने का अवसर मिलेगा .बेटे की बात सुनकर मोहनी का मोह भंग हो गया .
उसके सरे ख्वाब चकनाचूर हो गये .काटो तो खून नहीं .वह सोचने लगी मेरे बेटे क्या ?
इसी दिन के लिए मैंने तुझे इस काबिल बनाया था एक दिन तू मुझे अकेला छोडकर
कहीं और मौज मस्ती से दिन गुजार .मेरे बेटे पैसा ही सब कुछ नहीं होता .माँ की
आँखों मैंआंसू देखकर सुन्दरलाल बोला माँ क्या ? तुझे अपने बेटे पर भरोसा नहीं है।
व्यवस्था होने पर तुझे भी बुलवा लूँगा . मोहनी मन मार क्र बोली ठीक है बेटा ,तेरी
जैंसी मर्जी .तू जैसा उचित समझे उसे अपना गुज़रा हुआ अतीत चल-चित्र की तरह
सामने आनेलगा . उसे उसका भविष्य अंधकारमय नजर आने लगा .इतिहाश दुहराए
जाने की कगार पर था इसका मोहनी को य -हसास होने लगा था .

बेटा सुन्दरलाल अपनी पत्नी को लेकर अमेरिका चला गया ,माँ को भगवन
भरोसे छोडकर .नियति भी अनोखे खेल खेलती है सुन्दरलाल नियमित पैसे भेजता
रहा घर का खर्च ठीक से चलता रहा साहूकार का कर्ज भी पटता रहा .सुन्दरलाल ने
माँ को पुत्र रत्नप्राप्ति की सूचना दी सुनकर बोली बेटा मेरा मन पोते को देखने नाचल
रहाहै ,जल्दी आ मुझे ले जा .सुन्दरलाल बोला हाँ -हाँ माँ तुझे लेने जल्दी आता हूँ आने
की खबर करता हूँ .
मोहनी अपने बेटे के आने का इंतज़ार करती रही ,पर बेटे का आना तो दूर ,उसने पैसे
भी भेजना बंद कर दिया न ही कभी फोन ही किया .फोन करने पर हमेशा नो
रिप्लाई का सन्देश सुनाई देता .
यहाँ घर का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा था .उपर से साहूकार घर से बेदखल करने
की रोज धमकियाँ दे रहा था उसकी सुनने वाला कोइ नहीं था .वही हुआ जिसका उसे
डर था साहूकार ने गुंडे भेजकर उसे घर से बहर निकालकर कब्जा क्र लिया वह कुछ नहीं
कर सकी .
मजबूरी में उसे ब्रर्ध -आश्रम मैं शरण लेनी पडी यहाँ उसकी आत्मा चिल्ला-चिल्ला कर
कहती अपने किये की सजा सजा यहीं पर मिलती है.पाप का घड़ा फूटने में देर नहीं
लगती "खून का असर " कहीं नहीं जाता .वह अपना रंग दिखाता ही है"सोचो जो तुमने
अपने सास -ससुर के साथ क्या ?अच्छा किया था .जो सूरज लाल ने अपने माँ बाप के
साथ किया अब वही सुन्दरलाल तुम्हारे साथ कर रहा है ,क्योंकि वजह तुम्हीं थीं .
इश्वर के यहाँ देर हैपर अंधेर नहीं है वहसोचती काश मैं पाप का भागिदार न बनी होती
. तो ये दिन देखने नमिला होता बेटे पोते की याद लिये ,मन पर भारी बोझ लिए मोहनी
इस दुनिया को---------अलबिदा कह गयी !
*रमाकांत बड़ारया -दुर्ग 
************************************ श्री हरिशंकर परसाई ****************************************
__________________________________________________________________________________
      श्री हरिशंकर परसाई हिंदी साहित्य जगत की एकमहान विभूति !व्यंग के बादशाह के रूप में अपनाविशेष स्थान रखते हैंश्री हरिशंकर परसाई जी का जन्म 22.8.1924.कोइटारसी के पास होशंगाबाद जिले के ग्राम -जमानीमें हुआ .1936 -1937 मैं प्लेग फैला इसी दौरान आपकी माँ का देहांत हो गया . लगभग  5 साल केबाद पिता ने भी अंतिम साँस ली .भाई -बहनों में 
सबसे बड़े ,खूब पढने वाले ,खूब खेलने वाले औरखूब खाने वाले थे मस्त मौला व्यंग के बादशाह श्रीहरिशंकर परसाई जी .
गाँव में आरंभिक शिक्षा हासिल करने के बाद आपनागपुर आ गये .यहाँ आपने नागपुर विश्वविद्यालयसे एम ए हिंदी की परीक्षा पास की .अपने गर्दिश केदिनों का उल्लेख आपने बड़े ही अनोखे अंदाज़ मेंअपने एक रचना "गर्दिश के दिन"में किया है .बिना
टिकिट नौकरी की तलाश में होशंगाबाद, इटारसी',टिमरनी ,खंडवा खूब भटके .जंगल विभाग में कुछदिन नौकरी की ,कुछ दिनों तक अध्यापन कार्य केसाथ -साथ लेखन कार्य किया . नौकरी रास नहींआयी .नौकरी छोडकर स्वतंत्र लेखन कार्य प्रारंभ
किया और इसी में रम गये .इसके पश्चात नर्मदानगरी जबलपुर आ गये .जबलपुर आकर परसाई जी ने एक साहित्यक पत्रिका
"वसुधा "का प्रकाशन प्रारंभ किया जो उनके लिए घाटेका सौदा रहा .आर्थिक क्षति की वजह से पत्रिका काप्रकाशन बंद करना पड़ा .जिससे उनको गहरा सदमालगा। . .अपने लेख "गर्दिश के दिन " में उल्लेख करते हुए श्रीपरसाई जी कहते हैं "गर्दिश कभीथी अब नहीं है ,अबआगे भी भी नहीं होगी ------यह गलत है "मैं निहायतबैचैन मन का आदमी हूँ .मुझे चैन कभी मिल ही नहीं सकता .इसीलिये गर्दिश ही नियति है।सही बात यह है कोइ दिन गर्दिश से खाली नहीं है औरन ही कभी गर्दिश का अंत ही होना है यह और बात है किशोभा के लिए कुछ अच्छे किस्म की गर्दिशें चुन ली जाएँ .मेरे जैसे लेखक की एक गर्दिश और है भीतर में जितनाबबंडर महसूस करता हूँ उतना शब्दों मैं नहीं आ रहा .
हरिशंकर परसाई नाम का आदमी
जो हँसता है
जिसमे मस्ती है
जो ऐसा तीखा है
कटु है
यह कब गिरा
यह कब उठा
कैसे टूटा
यह निहायत कटु
निर्मम और धोबी पछाड़ आदमी है "
परसाई जी कहते हैं -
मैंने तय किया ,
परसाई डरो मत किसी से
डरे की मरे .
सीने के उपर कडा कर लो
भीतर तुम जो भी हो .
     परसाई जी कितनी सादगी साहस से बड़ी बातकहते हैं-जरा गौर करें --दिखाऊ सहानुभूति से मुझे बेहद नफरत है
अभी भी दिखाऊ सहानुभूति रखने वालों कोचांटा मार देने की इच्छा होती है जप्त कर जाता हूँवरना कई शुभ-चिंतक
 पिट जाते .
परसाई जी की साहित्यिक विशेषताएं एवं भाषा शैली
----------------------------------------------------------------
परसाई जी के लेखन की यह विशेषता है की उन्होंनेकेवल विनोद या परिहास के लिए नहीं लिखा .उनके लेखन में वैज्ञानिक जीवन द्रष्टी पाई जाती है .जोसमाज में फैले भ्रस्टाचार ,ढोंग ,अवसरवादिता औरकुप्रविर्तियों पर प्रहार करती नजर आती है .
लगातार खोखली होती जा रही हमारी सामाजिक औरराजनैतिक- व्यवस्था मैं पिसते मध्यम वर्गीय मन की सच्चाइयों को उन्होंने बहुत ही निकटता से पकड़ा है .परसाई जी की भाषा शैली में खास किस्म का अपनापनहै, जिससे पाठक यह महसूस करता है मानो कि लेखकउनके पास ही बैठा हो .पाखंड ,बे-इमानी ,आदि पर परसाई जी ने अपने व्यंगों के माध्यम से करारी चोट की है .वे बोलचाल की सामान्यभाषा का प्रयोग कर चुटीला व्यंग करने में बड़े माहिर थे .बेजोड़ थे ,बेजोड़ हैं .परसाई जी का कोई सानी नहीं है .श्री हरिशंकर परसाई जी की भाषा में व्यंग की प्रधानता हैइनकी भाषा समन्य्वी संरचना के कारण विशेष क्षमता रखती है .परसाई जी की कलम रुपी तीर से निकले एक-एक शब्द में व्यंग के तीखे पन को देखा जा सकता है .
परसाई जी ने अपनी रचनाओं में लोक प्रचलित हिंदी केशब्दों के साथ उर्दू और अंग्रेजी के शब्दों का खुलकरप्रयोग कियाहै.आप हिंदी के पहले रचनाकार हैं जिन्होंने व्यंग कोएक विधा के रूप मैं सम्मानजनक स्थान दिलवाया .व्यंगको शिखर पर पहुंचाकर ही दम लिया लिया इसके लि y साहित्य जगत उनका हमेशा आभारी रहेगा .श्री हरिशंकर परसाई जी अपने पाठकों के जबाब अपने एकनियमित कालम "पूंछिये परसाई से "के माध्यम से दियाकरते थे जो की दैनिक -देश बंधू समाचार पत्र में जबलपुर
और रायपुर से प्रकाशित होता था .बहुत ही लोकप्रिय हुआ .*श्री हरिशंकर परसाई जी की कुछ अनमोल कृतियाँ **
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आपके अनेक संस्मरण ,कहानी संग्रह,उपन्यास ,निबंधसंग्रह व्यंग प्रकाशित हुए जो अत्यंत लोकप्रिय हुए जो
निम्म्क्नुसार हैं .
1 .-हम एक उम्र से वाकिब हैं --- 2 .-जाने पहचाने लोग
3 .-भोलाराम का जीव -- 4-रानी नागफनी की कहानी
5--ज्वाला और जल -- -6- तट की खोज
7- हँसते हैं रोते हैं -- 8- जिनसे उनके दिन फिरे
9--तब की बात और थी -- 10--भूत के पॉँव पीछे
11-बे-ईमानी की परत -- 12-पगडंडियों का ज़माना
13--शिकायत मुझे भी है -- 14--सदाचार का ताबीज
15 --प्रेमचंद के फटे जूते --16--मति कहे कुम्हार से
17--काग -भगोड़ा --18 -वैष्णव की फिसलन
19--तिरछी रेखाएं -- 20-ठिठुरा हुआ गणतंत्र
21 --विकलांग श्रर्द्धा का दौर । --22-ऐसा भी सोचा जाता है
23 दो नाक वाले लोग 24- तिरछी रेखाएं
25 आवारा भीड़ के खतरे 26 बस की यात्रा
27भीड़ और भेदिये -28निठल्ले की डायरी
29 तुलसीदास चन्दन धिसे -30 परसाई रचनावली
31-अपनी-अपनी बीमारी 32सुनो भाई साधो
33-पाखंड का आध्यात्म 34-----------------
साहित्य -सेवा के लिए जबलपुर विश्वविध्यालय के द्वाराआपको डी .लिट् की मानद उपाधी प्रदान की गयी .आपकी रचनाओं का लगभग सभी भारतीय भाषओं एव अग्रेजी मैं अनुवाद किया गया है मलयालम मैं सर्वाधिक 4 पुस्तके .हैंश्री हरिशंकर परसाई जी को 1982 मैं उनके व्यंग "विकलांग श्रद्धा का दौर" के लिए साहित्य -अकादमी के पुरस्कार से सम्मानित किया गया .इस महान साहित्यकार ने 10.8.1995को जबलपुर में अंतिम साँस ली .साहित्य -जगत ,पाठकों के बीच अपनी धारदार कलम से उपजे साहित्य के माध्यम सेहमेशा अपनी उपस्थति का अहसास कराते रहेंगे .प्रेरणा के श्रोत बनेगे .
********** "विकलांग श्रद्धा का दौर" के कुछ अंश **************
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श्रद्धा का यह कोइ दौर है?देश में जैसा वातावरण है ,उसमे किसीको भी श्रद्धा रखने मैं संकोच होगा .श्रद्धा पुराने अखवार की तरह रद्दी में बिक रही है .विस्वास की फसल को तुषार लग गया है .इतिहाश में शायद कभी किसी जाति को इस तरह श्रद्धा औरविस्वास से हीन नहीं किया गया होगा .जिस नेत्रत्व पर श्रद्धा थी ,उसे नंगा किया जा रहा हैजो नया नेत्रत्व आया हैवह उतावली मेंअपने कपडेखुद उतर रहा है।कुछ नेता तो अंडर -विय र में हैं .कानून से विस्वास उठ गयाहै,अदालत से विस्वास छीन लिया गया है।बुद्धिजीवियों की नशलपर ही शंका की जा रही है .डाक्टरों को बीमारी पैदा करने वालासिद्ध किया जा रहा है .कहीं कोइ श्रद्धा नहीं ,विस्वास नहीं।मैं अपने श्रद्धालुओं से कहना चाहता हूँ "चरण छूने का मौसम नहीं है लात मारने कामौसम है .मारो एक लात और क्रन्तिकारीबन जाओ ".************************************हरिशंकर परसाई .
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मानो ऐसा लगता है यह व्यंगआज की परिस्थतियों से दुखीहोकरलिखा गया हो ,जिसकी कल्पना परसाई जी ने वर्षों पहले कर लीहो ऐसे त्रिकालदर्शी साहित्यकार को शत-शत नमन। '
न वक़्त रहता है न इन्सान रहते हैं ,
कहने को यहाँ किये कुछ काम रहते हैं"
जीवन भर के संघर्षों में प्रेरणा के जो श्रोत्र रहे हैं
मैं कैंसे भुला दूं उनको रमाकांत तुम्हीं बोलो
साहित्य जगत श्री परसाई जी के योगदान को कभी नहीं भुलासकता आपने वर्ष 1962 के विश्व शांति सम्मेलन रूस मैं भारतीय
प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया .एक साहित्कार के लिए यह बड़ासम्मान था .श्री परसाई जी के बारे मैं जितना गुणगान किया जाये कम है गहराईमें जितना उतरो उनके खजाने से एक नया मोती निकलता है .उनकी एक नई मारक शक्ति श्रोत का पता चलता है। हमे ऐसे प्रखर साहित्यकार पर गर्व है परसाई जी का साहित्य बहुत प्रेरणा दाई हैरास्ता दिखाने वाला है परसाई जी पर निम्म पन्तियाँ शत प्रतिशतखरी उतरती हैं .
*************गर्दिश ,मुश्किलों में आदमी निखरता है ************.
*************आग में तपकर जैसे कुंदन निखरता है *************
श्री हरिशंकर परसाई जी पर ये पन्तियाँ कितनी खरी उतरतीं हैं इसकोआपके शुभचिंतक अनुसरण करने वाले ,उनको करीब से जानने वालों से ज्यादा बेहतर और कोई नहीं जनता .इनकी रचनाओं को जिन्होंनेनहीं पढ़ा ,वे बहरीन ,और लाजवाब रचनाओं से वंचित हैं.अवस्य पढ़ेंमनन करें . पाठको से अनुरोध है की परसाई जी के सम्बन्ध में कोइ और रचना धर्मिता से     जुडीरोचक,जानकारी ,ससंस्मरण हो तो अवस्य हीबांटे .!-----------स्वश्री हरिशंकर परसाई जी के बारे में मैंने जितना जाना
****************************************************************************************************88रमाकांत बड़ारया -दुर्ग 
--------------------------------श्री मुकुटधर पाण्डेय जी ---------------------------------
     **जन्म --बालपुर (रायगढ -सारंगढ़ मार्ग )30.09.1895 *निर्वाण 06.11.1989** श्री मुकुटधर पाण्डेय जी का जन्म क्षतीसगढ़ की पावन माटी के एकछोटे से ग्राम बालपुर ,रायगढ़ जिला ,बिलासपुर में 30.09.1895 को धर्मऔर ममता की प्रति-मूर्ति माँ श्रीमती देवहुति देवी एवसंस्कृत के प्रकांडविद्वान् पिता पंडितश्री चिंतामणी पाण्डेय जी के पुत्र एव साहित्यानुरागी
सालिग्राम जी पाण्डेय के सु-पोत्र के रूप में सु-संस्कृत ,धार्मिक और परम्परावादी परिवार में जन्म हुआ .रायगढ़ निवास रहा तब कौन जनताथा यहीबालक आगे चलकर प्रखर छायावाद शब्द का साहित्य में जनक, बनेगा ताजपहनेगा ! क्षतीस गढ़ का नाम रौशन करेगा ! .श्री मुकुटधर पाण्डेय जी अपने आठ भाईयों में सबसे छोटे थे .कुल 8भाई4बहने 1-पंडितलोचनप्रसाद 2,--पंडितपुरसोतदास ,3-पंडित पद्मलोचन,4पंडित चंद्रशेखर 5-पंडितविद्याधर 6 -पंडित बंशीधर,7-पंडितमुरलीधर ,8 पंडित मुकुटधर पाण्डेय .जी !पंडित लोचन प्रसाद पाण्डेय जी की गड़ना दिवेदी युगीन साहित्यकारों मेकी जाती थी .साहित्य -जगत में विशेष स्थान रखते थे घर के साहित्यकवातावरण ने पंडित श्री मुकुटधर पाण्डेय मे साहित्य के प्रति रुझान उत्पन्न किया .क्योंकि घर पाठशालाहोतीहै.पंडित मुकुटधर पाण्डेय जी की बहनें1-चंदंकुमारी,2-यज्ञ्कुमारी ,3सूर्यकुमारी4-आन्द्कुमारी थीं ! सबसे छोटे होने के कारण पंडित मुकुटधर पाण्डेय जी कोभाईबहनों काअसीम प्यारमिला बचपन1 907में ही पिताश्री का देहांत हो गया
        आपकी आरंभिक शिक्षा गाँव मैं ही हुई .1915 में प्रयाग विश्वविध्यालय की प्रवेश परीक्षा उतीर्ण कर भर्ती हुए परन्तु आगे नहीं बढ़ पाए .1 पंडित मुकुटधर पाण्डेय जी ने 12 वर्ष की उम्र मैं लिखना आरंभ किया पर बचपनमेंपिता का निधन होने पर लेखन पर कोइ असर नहीं हुआ,निरंतरजारी रहा .तब कौनजनता था यहीबालक आगे चलकर मुखर छायाबाद का सरताज
बनेगा .
 साहित्य जगत में अपने माता पिता परिवार ,क्षतीसगढ़कपावनधराको अलंकृतकरेगा.हिंदी,अरबी,बंगला,उड़िय,अंगेजी
साहित्य का अध्यन घर पर ही किया .महानदी के पावन तट पर सहज ग्राम्य जीवनका रस लेते हुए पंडित श्री मुकुटधर
पाण्डेय जी ने अपनी लेखनी को इन्हीं माहोल में ढाला संजोया."ग्राम्य -जीवन"कवितामैं .देखिये ग्राम्य जीवन का वर्णन कितना सुंदर मनोहारी द्र्यश प्रस्तुत करती हैकविता ! क्या ऐसा वर्णन आजकी कविता में कहीं देखने मिलता है !--------
शान्ति पूर्ण लघु ग्राम बड़ा ही सुखमय होता है भाई
देखो नगरों से भी बढकर इसकी शोभा अधिकाई
उपर द्वेष छलहीन यहाँ के रहने वाले चतुर किसान
दिवस बिताते हैं प्रफुल्लित चित करते अतिथियों का मान
*मुकुटधर पांडे जी प्रकृति के बड़े प्रेमी थे जो आपकी रचनाओं में साफ-साफ झलकताहै ,एक बानगी देखिये ---
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कितना सुंदर और मनोहर ,महानदी तेरा यह रूप .
कल-कल मय निर्मल जलधारा ,लहरों की छटा अनूप .
तुझे देखकर शैशव की है,स्मर्तियाँ उर में उठतीं जाग
लेता है किशोर काल का ,अँगडाई अल्हड अनुराग .
कविता "मेरा प्रक्रति- प्रेम "में पंडित मुकुटधर पाण्डेय जी प्रक्रति का वर्णन यूँ करते हुए कहते हैं जरा गौर करें .----
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छोटे-छोटे झरने जो बहते सुखदायी
जिनकी अध्भुत शोभा सुखमय होती है भाई
पथरीले पर्वत बिशाल वृक्षों से सज्जित
बड़े-बड़े बागों को जो करते लज्जित
इन्हें देख कर मेरा मन प्रसन्न होता है
सांसारिक दुःख ताप छिन में खोता है
पर्वत के नीचे अथवा सरिता के तट पर
होता हूँ मैं सुखी बड़ा स्वछन्द विचरकर
*कविता "वर्षा बहार "में पंडित मुकुटधर पाण्डेय जी किसअनोखेअंदाज़ में वर्षा का वर्णन करते हुए मन मुग्ध कर देते हैं हैं करते गौर करें -------
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वर्षा बहार सबके मन को लुभा रही है ,
मैं नभ में छटा अनूठी ,घनघोर छा रही है .
बिजली चमक रही है,बदल गरज रहे हैं ,
पानी बरस रहा है ,झरने भी ये बह रहे हैं .
चलती है हवा ठंडी ,हिलती हैं डालियाँ सब
बागों में गीत सुंदर,अब गातीं हैं मलिनें अब .
तालों मैं जीव जलचर ,अति हैं प्रसन्न होते
फिरते काखों पपीहे ,हैं ग्रीष्म ताप खोते .
करते हैं नित्य वन में ,देखो ये मोर सारे ,
मेघ लुभा रहे हैं गाकर , सुगीत प्यारे .
खिलते गुलाब कैसा ,सौरव उड़ रहा है ,
बागों मे खूब सुख से ,आमोद छा रहा है .
चलते हैं हंस कहीं से ,बांधे कतार सुंदर ,
गाते हैं गीत कैसे ,लेते किसान मनहर .
इस भाँती है अनोखी ,वर्षा बहार भू-पर ,
सारे जगत की शोभा ,निर्भर है इसके ऊपर .
*विदेशी पक्षी कुररी समय मैं आकर अपना डेरा डाल लेता उसके विलम्ब से पहुचने पर वे उससे पूछते -हैं "कुररी "कविता मैं
कितनासुंदर वर्णन है देखें इसकी कुछ पंतीयाँ ----!
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बता मुझे ये विहग विदेशी अपने जी की बात
पिछड़ा था तू कहाँ ,आ रहा जो क्र इतनी रात .
निंद्रा मे जा पड़े सभी ,ग्राम मनुज स्वछंद
अन्य विहग भी निज नीडों में सोते हैं सानंद .
इस नीरव घटिका में उड़ता है तू चिंतित गात
पिछड़ा है तू कहाँ क्यों हुई तुमको इतनी रात .
श्री मुकुटधर पाण्डेय जी ,की नजरों मैं एक कवि कौन है इसका वर्णन यूँकरते हैं "कवि "कविता सरस्वती के अक्टूम्बर1919 के
अंक में प्रकाशितहुई थी देखें कुछ लाइनें ----
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नहीं -नहीं मेरे विचार में कवि तो है उसका ही नाम ,
यम-दम संयम के पालन युत होते हैं जिनके सब काम
रहती है कल्पना -कामिनी जिसके हिर्दय -कमल आसीन ,
संचालित करती सदेव जो भांति- भांति के भाव नवीन .
श्री मुकुटधर पाण्डेय जी की नजरों में कविता क्या है अपनी रचना"कविता " में यूँ वर्णन करते हैं जो 1917 में चन्द्र- प्रभा में प्रकाशितहुई थी पन्तियाँ देखें -----
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कविता सु-ललित परिजात हास है,
कविता नश्वर जीवन का उल्लास है .
कविता रमणी के उर का प्रतिरूप है ;
कविता शैशव का सुविचार अनूप है .
कविता भावोन्मतों का सुप्रलाप है,
कविता कान्त जनों का म्रदु आलाप है .
कविता गत गौरव का स्मरण विधान है ,
कविता चिर विरही का स-करुण गान है ,
देश की विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में आपकी रचनाओं का सम्मान के साथ प्रकाशन हुआ है मात्र 14 वर्ष की उम्र में आपकी पहली कविता1909 आगरा से प्रकाशित होने वालीपत्रिका स्वदेश में प्रार्थना पंचक शीर्षकसे प्रकाशित हुई.1916में प्रथम कविता संग्रह "पूजा के फूल "प्रकाशित हुआ .पंडित मुकुटधरपाण्डेय जी की प्रकाशि , कृतियाँ ,पुस्तकें निम्म लिखित हैं .जो पठनीय हैं। जानें असली कविता क्या है ?,छायावाद क्या है आनंद क्या है?
1पूजा के फूल -1916
2-शैलबाला -1916 -
3-कुसुम 1916
4-लक्ष्मा -अनुदित उपन्यास -1917
5-परिश्रम -निबंध -1917
6-साईं बाल -1917
7--हिर्दय -दान 1918
8मामा -------1918
7समाज कंटक 1918
8स्मृति-पुंज 1983
9-छायाबाद और निबंध -1983
10छायाबाद और श्रेष्ठ निबंध 1984
11-विश्व-बोध --1984
12"मेघदूत "-का क्षतीसगढ़ी अनुवाद
श्री मुकुटधर पाण्डेय जी की गध और पद्ध पर सामान पकड थी आपने मेघदूत का क्षतिसगढी भाषा मैं अनुवाद कर क्षतीस गढ़ी भाषा का मान-सम्मान बढाया को ख्याति प्रदान की बुलंदियों पर पहुँचाया आपकी कुछ प्रतिनिधि कविताएँ हैं -
1- किसान 2---ग्राम्य - जीवन 3- ग्राम- साफल्
4 महानदी 5-कुररी के प्रति --6-कृतज्ञन्य हिर्दय
7-खोंमचा वाला 8-जुगनू -9-गाँधी के प्रति 10 -तुलसीदास
11-शिशिर 12-विश्व -बोध 13-शारदा सम्मेलन 14-स्वागत
15 वर्षा बहार 16 बाल -परिचायक 17 मेरा प्रकृति -प्रेम
श्री मुकुटधर पाण्डेय जी की रचनाओं में छाया,और रहस्यवाद की अमिट छाप देखि जा सकती है आपका लेखन एतिहासिक मह्त्व का है .श्री जय शंकर प्रसाद जी के शब्दों में" छायावाद " शब्द का सबसे पहलेप्रयोग श्री मुकुटधर पाण्डेय जी ने ही किया था .छायावाद को परिभाषितऔर नामकरण करने का श्रेयपंडित श्री मुकुटधर पाण्डेय जी को ही जाता है .1918 में लोकप्रिय हो चुकी इस शैली केसम्बन्ध में 1920 में "जबलपुर से प्रकाशित होने वाली पत्रिका शारदा मैं आपकी लेख माला का प्रकाश प्राम्भ हुआ .हिंदी में छाया बाद "शीषक से 4 आर्टिकलश प्रकाशित हुए तो इस पर राष्ट्र व्यापी विचार विमर्श हुआ .प्रारभ में छायावाद ने एतिहशिक चुनोतियों ,का ,मिस-अंडर स्टेंडिंग का सामना किया ,कन्ट्रो -वर्षियों का सामना किया आलोचकश्री शांतिप्रिय दिवेदी ने सुकवि किंकरके नाम से छायावाद की कटु आलोचना की,व् श्री सुशील कुमार के आलोच्मात्म्क लेख के विरोध में आपने छायावादके समर्थन में पुरजोर वकालतकी.प्रति-उत्तर में मुकुटधर पाण्डेय जी ने एक लेखलिखा जिसका शीर्षक था"छायावाद क्या है?"जिसमे उन्होंने लिखा -!"लोग जिन्हें अंग्रेजी एवम बंगला भाषा का थोडा बहुत ज्ञान है वे आसानी
से समझसकते हैं की शब्द "छायावाद "का प्रयोग mysticism- (रहस्यवाद )केलिए होता है।आपके ही प्रयासों से छायावाद को मान्यता मिली सम्मानजनकस्थान प्राप्त हुआ .
    1920में सरस्वतीमें प्रकाशित कविता "कुररी के प्रति "श्री पदुमलाल पुन्नालाल जी बक्क्षी के अनुसार यह कविता "छायावाद "की प्रथम कविता है !कुररी के प्रति कविता एक ऐसी कविता है जिसमे छायावादके सभी तत्व समाहित हैं "कुररी के प्रति"कविताके सम्बन्ध मैं डा-शिवमंगल सुमन ने कहा था-"कुररी के प्रति कवितामैं तो भारतवर्ष की साडी सम्वेदना की परंपरा निहित है" हिंदी कविता में आपनेएक नये युग कीशुरुआत की ! देखें "कुररी के प्रति" कविता की कुछ पन्तियाँ ___
बता मुझे ऐ विहग विदेशी ,अपने जी की बात .
पिछड़ा था तू कहाँ ,आ रहा जो कर इतनी रात .
विहग विदेशी मिला आज तू बहुत दिनों के बाद
तुझे देखकर फिर अतीत की आई मुझको याद .
ऐसे ही हम साहित्य बिरादरी के लोग पुराणी पीढ़ी के साहित्यकारों के अतीत मैंझांक रहे हैं .उनका पूण्य स्मरण कर रहे हैं, ताकि साहित्य श्रजन ,पठान पठान मेंरूचि जगे .पथ प्रदर्शन हो .वर्ष 1928 में कलकत्ता की कांग्रेस अधिवेशन मे अपनी "किसान "कविता का पथकिया श्री मुकुटधर पाण्डेय जी ने कुछ वर्षों तक रायगढ स्टेट में दंडाधिकारी रहे उन्होंने कभी भी राजे महाराजों की वंदना मे लेखन नहीं किया.वे बड़े स्वाभीमानी थेचक्रधर ललितकला केंद्र रायगढ के वर्षों तक अध्यक्ष पद पर रहे .गरिमा प्रदान की .डा-विमल कुमार पाठक ने पंडित मुकुटधर पाण्डेय जी पर क्षतीसगढ़ी एक गीतलिखा जो वे अक्सर सुनाया करते,जो उनके प्रति सम्मान को दर्शाता है .देखें कुछ पन्तियाँ .-
मुकुटधर तुहर नाम हे भारी ,
तुम साहित्य -देवता अव जी हम अन तुहर पुजारी .
मुकुटधर तुहर नाम हे भारी
महानदी ले बोलेव तुमन
कुररी के मुंह खोलव तुमन
टेसू तिर तुम रोयेन धोयेन
अऊ किसान संग जागेन सोयेन .
सबले बोलेव अऊ गोठियायेव
जड़ चेतन भेद भुहुलायेन
छायावादी कविता लायेव
पद्मश्री पदवी ल पायेव .
ऋषि मुनि कस देखेन तुमला
नई मानेन संसारी .
मुकुटधर तुहर नाम हे भारी .
***सम्मान और अलंकरण **
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1--आपको वर्ष 1976 मैं पद्मश्री अलंकरण से सम्मानित किया गयाक्षतीसगढ़ के साहित्यकारों में इस सम्मान को प्राप्त करने       वाले प्रथमसाहित्यकार होने का गौरव आपको ही प्राप्त है
2-- साहित्य के योगदान के लिए रविशंकर विश्वविध्यालय एवंगुरू -घासीदास विश्वविध्यालय के द्वारा डी .लिट् की मानद      उपाधि प्रदान की गयी .
06 नवम्वर 1989 को क्षतीसगढ़ के अनमोल रत्न साहित्य -मनीषीप्रखर -साहित्यकार युग -पुरुष ने लम्बी बीमारी के बाद रायपुर मैं अंतिमसाँस ली , और दुनिया को अलविदा कहा .क्षतीसगढ़ ,साहित्य जगत आपकाहमेशा ऋणी रहेगा अन-मोल साहित्य के माध्यम से आप हमेशा याद किये जायंगेआपके पास यदिपंडित मुकुटधर पाण्डेय जी से जुडी रचना-धर्मिता से सरोकार रखने वाली कोई महत्व्पूर्ण जानकारी हो एवं प्रेरक संस्मरणों की जानकारी हो तोअवस्यही पाठकों तक संगवारी के माध्यम से पहुचाएं . जैसा मैंने जाना .
******************************रमाकांत बड़ारया . शंकर नगर -दुर्ग 9926529074

Friday, 21 August 2015

***********संघर्ष विजय का दुहराता हूँ मैं *********
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कदम  से  कदम  मिलाकर  सुबह  के  साथ  चलता हूँ  मैं
उम्मीद के साथ मंज़िल पर पहुँच कर डालेंगे पड़ाव  हैं हम .

हम  भी किसी से कम नहीं  बार -बार  विश्वासव  दिलाता  हूँ
नव अगर हमको डुबाये तैरकर निकलने का दम रखते हैं हम

कदम  से  कदम  मिलाकर  सुबह  के  साथ  चलता हूँ  मैं
उम्मीद के साथ मंज़िल पर पहुँच कर डालेंगे पड़ाव  हैं हम .

हम  भी किसी से कम नहीं  बार -बार  विश्वासव  दिलाता  हूँ
नव अगर हमको डुबाये तैरकर निकलने का दम रखते हैं हम

रह  सकेंगे  आप  कब  तलाक पानी में मगर से बैर मोल  लेकर
लोगों को हर जगह बस यही बात दुहराते हुये अक्सर पता हूँ मैं  .

मुठियों में कैद होकर चाँद लोगों की रह सकेगी स्वतंत्रता कब तक
लावा बनकर बह निकलेगी एक दिन आवाज़ बुलंद करते जाता हूँ मैं

अतियों  की आंधी में हरदम साहस से घुस टकरा जाया करता  हूँ
 बार -बार पराजय मिलने  पर भी  संघर्ष विजय का दुहराता हूँ  मैं

लकड़ी से निकलता है धुआं जब तक संग अनेको लोगों को पाता हूँ
सुलगते -सुलगते  आग  मगर अक्सर खुद को   अकेला पाता हूँ मैं

हर बार कुछ न कुछ किया करता हूँ कुछ करने न हो ऐसी बात नहीं
जुल्मों को नहीं सह सकता कदम-कदम चुनौतियाँ खड़ी करता हूँ मैं .

---------------------------रमाकांत बड़ारया "बेताब " दुर्ग ---------------
                                 -(रचनाकाल -३-५-१९७८० )
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Thursday, 20 August 2015



*******एक आग सुलगती है सीने में  *********
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रोज़ सबेरे आकर सूरज
अपनी किरणे बोता है
जग के तम को हर लेता है
एक आग सुलगती है सीने में
मन मैं छाया सदियों से अँधियारा
मेरे मन के तम को हर ले
वह सूरज कब आएगा

हर बरस घटायें आतीं हैं
 धरती की प्यास बुझातीं हैं
एक आग सुलगती है सीने में
 मेरा  मन सदियों से प्यासा
मेरे मन की प्यास बुझा  दे
वह बरखा कब आएगी

हर बरस बसंत बहारें आतीं हैं
गुलशन की मायूसी हर लेतीं हैं
मेरे मन में सदियों से मायूसी का डेरा
मेरे मन को खुशियों से पुलकित कर दे
वह बसंत बहारें कब आएँगी

        -----   रमाकांत बड़ारया "बेताब "दुर्ग -----
                  (रचना कल ४-८-१९७९)
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Wednesday, 19 August 2015

Monday, 17 August 2015

jaldee


                जल्दी जमा दोज  हुए
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मानवता को छोड़ आज आदमी देखो आदमखोर हुआ.
स्वार्थ  में अँधा होकर ये परहित धर्म को भूल गया.
करने को  तो थे परहित  के  इस  जग  में  काम बहुत से.
अपनों को खुश करने मैं लगा रहा नादाँ औरों को भूल गया.
पाकर  छोटा  सा  पद भी मूरख उसके मद मैं चूर हुआ.
मानवता को छोड़ आज आदमी देखो आदमखोर  हुआ.
ऊपर बैठा है जो काला गोरा देखने वाला सब कुछ देख रहा.
अहंकार  के आगे नादाँ सर्वशक्तिमान शासक को भूल गया.
जाने  कितने  लोगों  के आदमखोरों ने सपने  चकना  किये
भूल गए मगर इस सच्चाई को नादाँ ऐसे जल्दी जमी दोज़ हुए

-----------------------------रमाकांत बड़ारया "बेताब " दुर्ग 
********जैसा कारीगर होता है ********
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बेचारे दर्पण का कोई दोष नहीं है
चेहरा जैसा होता है वैसा ही दीखता है
बेचारे पत्थर का कोई दोष नहीं है
जैसा कारीगर होता है निर्मित होता है
बेचारे बृक्ष का कोई दोष नहीं है
जैसा बोया जाता है वैसा फल देता है
बेचारे डाकिये का कोई दोष नहीं है
जैसी खबर भेजोगे वैसी ही लाएगा
बेचारे कोयले का कोई दोष नहीं है
खुद कला होता है वैसे काला करता है
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-------रमाकांत बड़ारया "बेताब " दुर्ग 
************वही करते हैं घोषणा ********
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नफरत की आग मैं बेताब लोग जला करते हैं
अपने वादों से लोग यहां हररोज़ फ़िरा करते हैं
इंसाफ का तराजू लिए जो बैठे हैं आज गद्दी पर
कत्ल इंसाफ का वही लोग किया करते हर पल
आदमी से बेहतर होता है जानवर जिनके सामने
इंसाफ की गद्दी पर उन्हें ही बैठाया था आम ने
भ्रस्ट -आचरण का होता है जिनके विरुद्ध फैसला
भ्रस्टाचार उन्मूलन की वही लोग करते हैं घोषणा
----------------रमाकांत बड़ारया "बेताब" दुर्ग -----
(रचनाकाल २८.६-१९७५ )
*****प्रसिद्धी सर पर ज्यादा देर नही रहती ********
++++++++++++*सार्थक पहल ++++++++++++
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उन साहित्यकार के लिए लिए जो साहित्यक कार्यक्रम 
आयोंजन के निमंत्रण पर स्वार्थ सिद्दी( रेल किराया , 
आसन ,लिफाफा संभावित ) का आस्वासन न होने पर
भड़क गए और तमीज सीखने का तीर चला दिया .एक
कहावत को हर कोई जनता है प्रचलित है
**********डायन भी एक घर छोड़ती है **************
आम आदमी इसे जनता है आसमान मे खोखली ख्याति
के नशे मैं चूर वे साहित्यकार भले ही न समझें आम आदमी
इसे भी अच्छी तरह जनता है
**********नशा ,लालच ,क्रोध नाश की जड़ होती है ******
भले ही एक अहंकारी साहित्यकार आँखें होकर भी अंधे का
पाठ करते हुए अशोभनीय हरकत करने लगे ,नजर आये तो
संगवारी के १२-४-१५ बिलासपुर के आयोजन परिचर्चा का विषय
**********साहित्य की दिशा दायित्य और चुनौतियां ***********
सार्थक लगता है क्योंकि ये निश्चित ही साहित्यकार की भूमिका
पर उसकी मानसिकता,उसकी सक्रियता,निष्क्रियता पर,और उसकी
रचनात्मक सोच पर निर्भर करता है .हहम संगवारी जन निस्वार्थ
साहित्य,संस्कृति ,कला को उन्चैयों पर ले जा रहे हैं देश के नामी
साहित्यकार हमारा हौसला बढ़ाने हमसे जुड़ रहे हैं कार्यक्रमों मैं आ
रहे हैं हमारे अपने कुछ अहंकारी साहित्यकार जाने किस मिटटी के
बने हैं अपने आगे दूसरों को बौना समझ रहे हैं .पर वो भूल जाते हैं
छोटा ही चलकर महान होता है ,काम से ही नाम होता है उनको बस
छोटे मुह बड़ी बात किसी शायर ने कहा है
,,***********प्रसिद्धी किसी के साथ ज्यादा देर तक नहीं रहती *******
************ बड़ी मंज़िल हमेशा ही खतरे मैं रहती है **********
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*********व्यर्थ ही न जलो इश्क़ में ***********
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अक्ल खो दी है न जाने कितनो ने जुनूने इश्क़ में .
है आग का दरिया ये,व्यर्थ ही न जलो इश्क़ में .
घर जो जले कई बदन भी कई जले हैं इश्क़ में ..
फिर भी आमादा -ए -सौदा हुये हैं लोग इश्क़ में .
दिन में दिखते हैं ख्वाब रात की बात है कुछ और .
मान जाइये सिवा बर्वादी के हासिल न होगा इश्क़ में .
मंज़िल न मिल सकी "बेताब " मुझको तेरे वगैर .
दिले -शिकस्ता लिए फिरता हूँ कमसिन तेरे इश्क़ में .
------------------रमाकांत बड़ारया "बेताब " दुर्ग ------
**********मदद में रहते आगे हम हैँ *******
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करते कम काम और बताते जो ज्यादा हैं
अहसान जताने में लोग वही आमादा हैं
दिखने में भोले भाले हमको जो दिखते हैं
लूट मचाने वालों में वो ही यहां अगुआ हैं
चेहरा न देखो दिल को देखो कहते सब हैं
चेहरों पर मर मिटने वालों में आगे सब हैं
वक्त पड़े और काम न आवे जो दानव सम है
वक्त संकट पर काम आएं जो देवों के सम हैँ
कितनी भी मुश्किल हो राह न कुछ भी आसाँ हो
मानव संकट में घिरता मदद में रहते आगे हम हैं


*****ये मैं नहीं कहता **_----------------
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कम ज्ञान
खतरनाक होता है 
ज्यादा ज्ञान
बड़ा खतरनाक होता है
ये मैं नहीं इसे
सारा जमाना कहता है
सौ मुर्ख
दोस्तों से अच्छा
एक ज्ञानी और
समझदार मित्र
ज्यादा अच्छा होता है
ये मैं नहीं इसे
सारा जमाना कहता है
बॉस की अगाडी
नहीं होती अच्छी
बॉस की पिछाड़ी भी
नहीं होती अच्छी
ये मैं नहीं इसे
सारा जमाना कहता है
पुलिश से
न दोस्ती अच्छी
न दुश्मनी अच्छी
ये मैं नहीं इसे
सारा जमाना कहता है
एक साहित्यकार
जब तक
कालजयी रचना कर सकता है
जब तक वह
पुरस्कार की लालच मैं
अपने स्वाभिमान बेचकर
तलुवा चाटने वाले
साहित्यकारों की
जमात मैं
शामिल नहीं होता
क्योंकि
उसकी मति मारी जाती है
जिसकी मति मरी जाती है
भला रचना निर्माण मैं
ध्यान लगेगा कैसे
ये मैं नहीं कहता
सारा जमाना कहता है
लातों के भूत
कभी बातों से नहीं मानते
जैसे के तैसा ही
बनना पड़ता है
व्यवहार करना पड़ता है
ये मैं नहीं सारा जमाना कहता है
*********कोशिश कर रहा है --------!!!!!
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बनकर कांटा पैरों में चुभ गया था जो
सुंदर फूल बनकर महकने की देखो
व्यर्थ कोशिश कर रहा है कल-आज-कल
कण बनकर आँखों में घुस गया था जो
काजल बन आँखों मैं लगने की देखो
व्यर्थ कोशिश कर रहा है कल आज- कल
बनकर घातक रोग लग गया था जो
राम बाण दवा बन दर्द हरने की देखो
कोशिश कर रहा है कल आज- कल
चढ़कर छोटी पर फिसल गया था जो
खुद को पहाड़ साबित करने की देखो
व्यर्थ कोशिश कर रहा है कल आज -कल
बनकर अंधकार घर मैं छा गया था जो
सूरज बनकर उजाला करने की देखो
व्यर्थ कोशिश कर रहा है कल आज -कल
अनगिनत घाव दिया था बदन पर जो
घावों इर मरहम पट्टी करने की देखो
व्यर्थ कोशिश कर रहा है कल आज - कल


********गर्व करो यदि तुम****
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गर्व करो यदि तुम
देश के अंदर रहकर 
किसी भी जनजागरण
नारी सशक्तिकरण
नशा मुक्ति कार्यक्रम
बेटी बचाओ अभियान
स्वच्छ भारत
निर्मल भारत अभियान
भारत को भ्र्ष्टाचार मुक्त बनाने
पर्यावरण को
ध्वनि धुवाँ मुक्त बनाने
वृक्ष बचाओ बृक्ष लगाओ
नदियों तालाबों को
साफ सुथरा बनाने
गरीब मजदूर किसान को
उनका वाजिब हक़ दिलाने
बेरोजगारों को काम दिलाने
साहित्य को
फर्जी साहित्यकारों से
मुक्ति दिलाने
जुगाड़ुओं से
वाजिब हकदारों को
मुक्ति दिलाने
भरष्ट्र अपराधीयो दलालों
घोटालेबाज
जनप्रधि निधियों से
कालाबाजारी मिलावट करने वाले
व्यापारियों
कानून के खिलाफ
कामं करने वाले
अधिकारीयों कर्मचारियों के खिलाफ
देश के मान सम्मान
के लिए
अपना सर्वस्त निछावर करने
किसी अभियान
किसी कार्यक्र्म
किसी गृप -संस्था संस्थान
का हिस्सा हो
ऐसे हर सेक्स को
मेरा सौ सौ बार नमन
***********नादान नहीं रहे हम *************
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सावधान रहना
निकल पड़े हैं
गली गली में,गाँव गाँव में 
बदनाम बस्ती के लोग
मगर मच्छ के
आंसू बहाने वाले लोग
बगुला भगत \
अवसर पाकर दबोचते रहे हैं
मछली की तरह
इंसानो को
स्वार्थ सिद्दीके लिए
लूटने से भी और
लुटाने से भी
नहीं चूके
मूँद लीं थी ऑंखें
बर्बाद करने से भी नहीं चूके
इंसानियत को
सावधान रहना
निकल पड़े हैं
गली गली में गाँव गाँव में
बदनाम बस्ती के लोग
खोजने उनको
बर्बाद हुये थे जो
कभी उनके ही कुृत्यो से
कहने समझाने उनको
आबाद नहीं किया है
तुम्हे अब तकम शासक ने
अवसर दो अपना लो हमको फिर से
तौबा कर ली है हमने
वादा करते हैं हम
आने नहीं देंगे वापस
दुर्दिन वह दिन
कैसी विडंबना है
चाहता है वह उसी से शरण
जिसका
किया था जिसने बलात अपहरण
सावधान रहना
ञ्जक्ल पड़े हैं
गली गली में गाँव गाँव
बदनाम बस्ती के लोग
जब भी आएं पास तुम्हारे
कहो उनसे
आज तुम हो जहाँ
वही जगह है तुम्हारे लिए बेहतर
मत करो शोर वरना
हो जाएगी तुम्हारी हालत
उससे से भी बदतर
उबरे नहीं हो तुम अब तक
अच्छी तरह जानते हो तुम
नादान नहीं रहे हम
अच्छी तरह समझ गए हैं हम
उस सर्प की तरह हो तुम
पीकर दूध भी
मरने से जो नहीं चूकता फन
भूल गए हो तो कर लो याद
दूध का जला हुआ
फूक फूक कर भी
पीता है छाछ !!
************वो ही खुद होता है !!**************
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क़यामत तक कोई कभी किसी का साथ नहीं देता 
राह मैं साथ चलने वाला ही अक्सर दगा देता है
मुश्किलों से उबरने की बातें तो करते हैं लोग बहुत 
मुश्किलों से जो भी उबार देता है वो ही खुद होता है
-------------रमाकांत बड़ारया ""बेताब "दुर्ग 
*********बड़ा प्र्श्न चिन्ह लगती है *******
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दो साहित्यकार मित्र 
आपस में बतिया रहे थे 
एक साहित्यकार 
किसी गलतफहमी का
शिकार होकर
दूसरे साहित्यकार से कह रहा था
बंधू !
कुछ लोगों को
बड़ी गलत फहमी है
उन्होंने मुझे अपनी
साहित्य समिती का
पदाधिकारी बनाया है
शायद वो ये नहीं जानते
मैं !
किसी की बदौलत नहीं
खुद अपनी क़ाबलियत से
चुना गया हूँ !!
दूसरा साहित्यकार
चुपचाप सुन रहा था !
जब सहन से बाहर हो गया
तब बोला बंधू !
आप ऐसा क्यों कह रहे हैं
जबाब में,
पहले वाले साहित्यकार ने कहा
मैंने ऐसा सुना है !
तब दूसरे साहित्यकार ने कहा
हम ही कहते हैं
सुनी सुनाई बातों पर
विस्वास नहीं करना चाहिए
कान का कच्चा
कभी भी
किसी का हितैसी नहीं हो सकता
हम ही कहते हैं
शक की कोई दवा नहीं होती
तुम साहित्यकार होकर
शक के आधार पर ऐसा कहते हो
खुद को कान का कच्चा
साबित करते हो
क्यों जहर पीते हो
साहित्यकार की गरिमा को
क्यों कम करते हो !
अपनी क़ाबलियत पर
क्यों कालिख लगते हो
आपकी क़ाबलियत पर शक होता है
साहित्यकार का फर्ज है
शक करने वालों को
नसीहत लगाये
अपने ज्ञान की गंगा से
निर्मल मन बनाये
आप तो खुद ही भटक गए हो
दूसरों को क्या रास्ता दिखाओगे
और गौर से सुनो
किसी के चुनाव मैं
क़ाबलियत मायने नही रखती
अक्सर नाकाबिल
पद हथिया लेते हैं
या किसी को सबक सिखाने
चालक
दूसरों को मोहरा बना लेते हैं
या रबर स्टेम्प को ही
आगे कर खड़ा कर
चुनाव जित्वा देते हैं
कोई अगर ये कहता है
की उसने
तुम्हे पदासीन करवाया है
तो क्या गलत कहता है
जब कोई
किसी प्रतयासी को
खड़ा नही करेगा
उसका समर्थन नहीं करेगा
उसके पक्ष मैं
वोट नही करेगा
तो वह जीतेगा कैसे !!
आपका दोष नहीं है
कुर्सी और पद की महिमा ही ऐसी है
अच्छे - अच्छों के
आचरण मैं खोट ला देती है
घमंडी सक्की
हितैषियों को भी
दुश्मन बना देती है
मैं नहीं कह सकता
आपका मामला क्या है
इतना तय है
आपकी सोच
आपको अविस्वस्नीय बनाती है
आपके साहित्यकार होने पर
बड़ा प्रश्न चिन्ह लगती है !!
==========रमाकांत बड़ारया "बेताब"