Monday, 17 August 2015

*************नहींन सोचने वाले लोग ************
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"कितना भी समझाओ यारो , नहीं समझने वाले लोग
जिसको जो करना है करने से, बाज नहीं आने वाले लोग
अपनी ढपली अपना राग ,अलापने मैं खर्च नहीं आता है
किसकी जिंदगी मैं फर्क पड़ेगा , नहीं सोचने वाले लोग
सुबह से लेकर शाम तलक जो, खेतों मैं खून पसीना करता है
उसकी मेहनत पर भी डाका, डालने से यहां नहीं चूकते लोग
समझदारी से मिल -जुलकर ,परिवार चलाने जिम्मा है जिनका
"बेताब "मिल जुलकर रहने के,बदले राह अलग बनाते मिलते लोग
नैतिकता का पाठ पढ़ना आदर्श सामने रखना जिम्मा जिनका
आदर्शों की बखिया उघाड़ने मैं , वही यहां यारो लगे हुये लोग
अपना क्या है हमने जो भी देखा , बाँट लिया अपना दुःख -दर्द
फर्ज समझ कर दिया उजागर मर्ज ,दवा बनेगे खुद इसकी लोग .
------------------------रमाकांत बड़ारया "बेताब " दुर्ग 

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