Monday, 17 August 2015

कुछ 
एम -बी- एस- मुन्ना भाई टाइप
देश के, राज्य के
स्थानीय साहित्यकार 
बेसरम के पौधे की तरह 
खाट मैं खटमल की तरह
गुड के उपर मख्खी की तरह
नजर आते हैं
खुद के नाम के आगे
वरिष्ठ होने का ठप्पा
लगाने -लगवाने
के लिए मरे जाते हैं
साहित्य के क्षेत्र मैं
उनकी उपलब्धी
कुछ हो न हो
पर खुद के गले मैं
वरिष्ठ साहित्यकार होने का
बिल्ला लगाये अवश्य मिलेंगे
चापलूसी के बल पर
दलाली देकर
मंच पर आसीन मिलेंगे
सम्मानित करवाते
अखवारों मैं छपेंगे
नेताओं की तरह
रंग बदलते मिलेंगे
नवोदित कवियों का
उत्साह वर्धन करने की बजाय
उन पर फब्तियां
कस्ते मिलेंगे
नवोदित कवि की कविता
या कोई रचना
कितनी भी बृहतरीन
क्यों न हो
कुछ निर्मल मन वालों को छोड़कर
तारीफ करते नहीं मिलेंगे
तथाकथित उनसे बड़े
कहेजाने वाले की
घटिया से घटिया रचना की
तारीफों के पुल
बांधते मिलेंगे
याने उनके द्वारा
किये किसी एहसान का
कर्जा उतारते मिलेंगे
अथवा उनका वरदहस्त
उनके कन्धों पर हो
फ़िराक मैं रहेंगे
मैं देखता हूँ सुनता हूँ
पढता हूँ
तभी निष्कर्ष निकालता हूँ
बारूद के ढेर पर
बैठने से नहीं डरता हूँ
अनुरोध है सबसे
एक आप ही हैं
जो अपनी कलम के बल पर
वक़्त बदल सकते हो
इन तथाकथितों से
अनुरोध है
अपना स्वार्थ त्यागो
अपना रास्ता बदलो
अच्छों को सदा अच्छा कहो
बात कोई अच्छी हो तो
सराहो उसको
छोटे ने कही है इसलिए उसे
नजर अंदाज़ मत करो
दलालों और चापलूसों से
साहित्य की दुनिया को
गन्दा होने से बचाओ
अपना ध्यान कालजयी
साहित्य श्रजन मैं लगाओ
जो आज कम देखने मिलता है
बिकने वाला
अश्लील साहित्य ज्यादा
नजर आता है

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