******खूंटी पै टंगा पिता का कोट ****
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पिता का खूंटी पै
टंगा हुआ कोट
दीवाल पर
लटकी हुई छड़ी
अनमोल खजाना है
बंद तिजोरी है
कोट और छड़ी
न जाने
क्या -क्या भरा है उसमे
बड़ी से बड़ी
मुश्किलों की चिंता से
उबार देता है
खूंटी पै टंगा हुआ कोट
एक टक भर
देखने से उसकी ओऱ
निकल जाता है
बड़ी से बड़ी समस्या का हल
सिर्फ कोट न समझो मुझे
सुनाई देता है
कानो मैं मेरे
मध्यम -मधयम स्वर
मत डरो मैं हूँ न
कोट से निकलकर
लाठी बजाते हुए
समां जाते हैं मेरे पिता
मेरे अंदर
बन जस्ते हैं मेरी ढाल
पिता उस पेड़ की तरह हैं
जो छाया भी देते हैं
और देते हैं
मीठे -मीठे फल
क्या हुआ जो हम
भूल गए उनके प्रति
अपना कर्तव्य और फर्ज
क्या हुआ जो हम
भूल गए
चुकाना उनकी सेवा
चिंता का कर्ज
पर "बेताब " वे नही भूले
कोट और लाठी के रूप मैं
निभा रहे हैं
अब भी
अपना कर्तव्य और फर्ज
चुका रहे हैं तुम्हे
दुनिया मैं लाने का कर्ज !
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पिता का खूंटी पै
टंगा हुआ कोट
दीवाल पर
लटकी हुई छड़ी
अनमोल खजाना है
बंद तिजोरी है
कोट और छड़ी
न जाने
क्या -क्या भरा है उसमे
बड़ी से बड़ी
मुश्किलों की चिंता से
उबार देता है
खूंटी पै टंगा हुआ कोट
एक टक भर
देखने से उसकी ओऱ
निकल जाता है
बड़ी से बड़ी समस्या का हल
सिर्फ कोट न समझो मुझे
सुनाई देता है
कानो मैं मेरे
मध्यम -मधयम स्वर
मत डरो मैं हूँ न
कोट से निकलकर
लाठी बजाते हुए
समां जाते हैं मेरे पिता
मेरे अंदर
बन जस्ते हैं मेरी ढाल
पिता उस पेड़ की तरह हैं
जो छाया भी देते हैं
और देते हैं
मीठे -मीठे फल
क्या हुआ जो हम
भूल गए उनके प्रति
अपना कर्तव्य और फर्ज
क्या हुआ जो हम
भूल गए
चुकाना उनकी सेवा
चिंता का कर्ज
पर "बेताब " वे नही भूले
कोट और लाठी के रूप मैं
निभा रहे हैं
अब भी
अपना कर्तव्य और फर्ज
चुका रहे हैं तुम्हे
दुनिया मैं लाने का कर्ज !
---------रमाकांत बड़ारया "बेताब " दुर्ग
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