********फर्ज़ एक साहित्यकार का********
============================
में अपनी आवाज़ को
पहुचाना चाहता हूँ
तुम्हारे कानों तक
कारण बहुत ही साफ है
तुम्हारे थके हुए पावँ
गतिहीन ना होने पायें
और तुम्हारा मस्तिस्क
निष्क्रिय ना होने पाए
तुम्हारे रुके हुए पाँव
पुनह ; गतीमान हो जाएँ
निष्क्रिय मस्तिस्क तुम्हारा
पुनह; किर्याशील हो जाये .
तुम्हारे अंध -विस्वास
और तुम्हारी मान्यताएं
जिनका आधार खोखला है ,
तुम उनको त्यागो .
अन्धकार से उजाले में आओ
तुम जिहे पूजते हो
पूजने के वे काबिल नहीं हैं .
तुम्हे जिन्हें पूजना चाहिए
वे तुम्हे हासिल नहीं हैं
उन तक पहुचने का रास्ता बताउं.
मैं एक साहित्यकार हूँ
मेरा यह फर्ज़ है तुम्हे
सही और आसान रास्ता बताउं
सही और गलत मे
छोटे से छोटा अंतर बताऊँ .
यदि गलत रस्ते पर
चल पड़े हो तो सही राह दिखाऊं
अपने साहित्यकार होने का धर्म निभाऊं
कितनी हास्यास्पद स्थिति होगी
दिशा प्रदान करने क़ी बजाय
मैं भ़ी भ़ी वही करने लगूं
जो बुध्धीहीन और
पथ-भ्रष्टकरने मैं लगे हुए हैं
बे शर्मी से कह रहे हैं
हमे क्या लेना -देना है
सब चलता है
वे गलत फहमी का शिकार हैं
ज्ञान क़ी महत्ता तभी है
जब उसे बांटा जाये
समय-समय पर ज्ञान
ज्ञानियों से ग्रहण भ़ी किया जाए
ज्ञान प्राप्त करने मे शर्म कैंसी
रमाकांत सीखने क़ी कोई
ना सीमा होती है ना ही उम्र .
आज जब कोई साहित्यकार
किसी नवोदित रचनाकार को
उसकी कमियों क़ी ओर
निस्वार्थ इंगित करता है तो
उसे उसके जमीर पर चोट
होती नजर आती है
उसे गुमराह करने वालों क़ी फौज
उसके साथसीना तानकर
खडी नजर आती है
मत भूलो गुरू के वगैर
ज्ञान अधूरा है .
जब जागो तभी सबेरा है
वरना अधेरा ही अधेरा है ..
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में अपनी आवाज़ को
पहुचाना चाहता हूँ
तुम्हारे कानों तक
कारण बहुत ही साफ है
तुम्हारे थके हुए पावँ
गतिहीन ना होने पायें
और तुम्हारा मस्तिस्क
निष्क्रिय ना होने पाए
तुम्हारे रुके हुए पाँव
पुनह ; गतीमान हो जाएँ
निष्क्रिय मस्तिस्क तुम्हारा
पुनह; किर्याशील हो जाये .
तुम्हारे अंध -विस्वास
और तुम्हारी मान्यताएं
जिनका आधार खोखला है ,
तुम उनको त्यागो .
अन्धकार से उजाले में आओ
तुम जिहे पूजते हो
पूजने के वे काबिल नहीं हैं .
तुम्हे जिन्हें पूजना चाहिए
वे तुम्हे हासिल नहीं हैं
उन तक पहुचने का रास्ता बताउं.
मैं एक साहित्यकार हूँ
मेरा यह फर्ज़ है तुम्हे
सही और आसान रास्ता बताउं
सही और गलत मे
छोटे से छोटा अंतर बताऊँ .
यदि गलत रस्ते पर
चल पड़े हो तो सही राह दिखाऊं
अपने साहित्यकार होने का धर्म निभाऊं
कितनी हास्यास्पद स्थिति होगी
दिशा प्रदान करने क़ी बजाय
मैं भ़ी भ़ी वही करने लगूं
जो बुध्धीहीन और
पथ-भ्रष्टकरने मैं लगे हुए हैं
बे शर्मी से कह रहे हैं
हमे क्या लेना -देना है
सब चलता है
वे गलत फहमी का शिकार हैं
ज्ञान क़ी महत्ता तभी है
जब उसे बांटा जाये
समय-समय पर ज्ञान
ज्ञानियों से ग्रहण भ़ी किया जाए
ज्ञान प्राप्त करने मे शर्म कैंसी
रमाकांत सीखने क़ी कोई
ना सीमा होती है ना ही उम्र .
आज जब कोई साहित्यकार
किसी नवोदित रचनाकार को
उसकी कमियों क़ी ओर
निस्वार्थ इंगित करता है तो
उसे उसके जमीर पर चोट
होती नजर आती है
उसे गुमराह करने वालों क़ी फौज
उसके साथसीना तानकर
खडी नजर आती है
मत भूलो गुरू के वगैर
ज्ञान अधूरा है .
जब जागो तभी सबेरा है
वरना अधेरा ही अधेरा है ..
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