Monday, 17 August 2015

*************हकीकत ***************
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१--दिन -ब -दिन कंक्रीटों के बढ़ते गये खेत .
त्यों - त्यों घटते गये पेट पालते खेत
२--बहती हुई दरिया में
आदर्शों की रोज डूबती नाव .
जब से सूखी दरिया में
धूर्तों की चल निकली नाव
३--पहले जैसे खुशाहांल नही रहे अब गाँव .
पढ़ कर जब से युवक शहर में बना रहे ठांव
.
४ सपने सुनहरे दिखा रहे हैं जो-जो लोग
सारी सुविधाओ का लुफ्त उठा रहे वे लोग
सपने सुनहरे देखते हैं आज जो भी लोग
अपने बच्चों सहित सो रहे वे भूके पेट
सारी घोषणाओं से बंचित हैं ऐसे ही लोग

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