Tuesday, 1 September 2015

**************माखौल उड़ा रहे थे *****************
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हम तो शोषित और पीड़ितों की बात कर रहे थे
वो अपने स्वार्थ मैं लिप्त हो लोगों को डरा रहे थे
उनका इतिहास उठा के देख लो समझलो खूब
अपने स्वार्थ के लिये देश को लूट रहे-लूटा रहे थे
शांतीदूतों परबरसाने लाठियां दामन में जिनके दाग
चापलूस यहां हंसकर- उनके हौसले बढ़ा रहे थे
खुलकर बात कहने का जिनने समय दिया कभी नहीं
अपनी बात को ताल ठोक कर कहो जुमले चला रहे थे
हाथ में जब भी किसी के यहां सत्ता रुपी ताकत नही रही
"बेताब" साठ-गांठ कर लोग अपना माखौल उड़ा रहे थे
----------------------रमाकांत बड़ारया "बेताब " दुर्ग ----------------

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